गुरुवार, 1 नवंबर 2007

ज्योतिष

प्राचीन तथा अर्वाचीन समस्त इतिहासकारों ने वेद को प्राचीनतम तथा अपौरूषेय बताया है तथा प्रसिद्ध मानव धर्मशास्त्र प्रणेता मनु ने इसके लिए अपनी अभिव्यक्ति इस प्रकार की है:-

वेदो खिलो कर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम।
आचारच्श्रैव साधुनामात्मनस्तुष्टिरेव च।।

इसके व्याकरण आदि छ: अंग हैं, जैसे मुखरूप व्याकरण, नेत्ररूप ज्यौतिष, कर्णरूप निरूक्त, हस्तरूप कल्प, नासिकारूप शिक्षा तथा पदारूप छन्द:-

शब्दशास्त्र मुखं ज्यौतिषं चक्षुषी
श्रोयमुक्तं निरूक्तंु च कल्प: करौ।
या तु शिक्षास्य वेदस्य सा नासिका
पादपद्मद्वयं छन्द आद्यैर्बुधै:।।

वेदपुरूष का नेत्ररूप होने के कारण ज्यौतिष सब अंगों में श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि शारीरिक समस्त अवयवों में नेत्र की प्रधानता होती है।

वेदचक्षु: किलेदं स्मृतं ज्यौतिषं
मुख्यतया चाग्ङमध्ये स्य तेनोच्येते।
संयुतो पीतरै: कर्णनासादिभि-
श्चक्षुषाग्ङेन हीनो न किश्चित्कर:

इस नेत्ररूप शास्त्र के सिद्धान्त, गणित और फलित ये तीन अंग हैं। जिनमें क्रम से सौर, सावन, चान्द्र, नक्षत्र, पृथ्वी-गृह आदि की स्थिति का वर्णन; व्यक्त अव्यक्त आदि अनेक प्रकार के गणित का प्रतिपादन तथा जन्मकाल के प्राणियों के जीवनादि सम्बन्धी समस्त घटनाचक्रों के फल का निरूपण किया गया है।

इस प्रकार इसका क्षेत्र बहुत व्यापक है और इसके समस्त स्कन्धों का ज्ञान प्राप्त करना दुरूह नहीं तो साधारण बोधगम्य भी नहीं है। इसके साथ ही मानव के हर प्रकार के व्यावहारिक दिनचर्य्या से सम्बद्ध होने के कारण, इसका थोड़ा-बहुत ज्ञान प्रत्येक प्राणी के लिए आवश्यक भी है।

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