सोमवार, 25 अगस्त 2014
बुधवार, 20 अगस्त 2014
मंगलवार, 19 अगस्त 2014
शुक्रवार, 3 अगस्त 2012
क्या आप डिप्रेशन में हैं? यह करें
About Me
ज्योतिष विद्या
यह ब्लॉग मैंने अपनी रूची के अनुसार बनाया है इसमें जो भी सामग्री दी जा रही है वह मेरी अपनी नहीं है कहीं न कहीं से ली गई है। अगर किसी के कॉपी राइट का उल्लघन होता है तो मुझे क्षमा करें।
View my complete profile
Blog Archive
• ▼ 2011 (952)
o ▼ August (45)
क्या आप डिप्रेशन में हैं? यह करें
घर से निकलते समय इस मंत्र का जप करें
घर से निकलते समय इस मंत्र का जप करें
मनोकामना पूर्ति के अचूक गुप्त उपाय
बिजनेस, प्यार, दोस्ती...ऐसे नाम वालों से रहें सावध...
हनुमानजी को चढ़ाएं ये तीन लाल चीजें, हो जाएंगे सब ...
मोर पंख का प्रयोग
वास्तु दोष निवारक महायंत्र
इस मंत्र जप से मिलेगी रोगों से मुक्ति
नींद नहीं आती? तो यह टोटका करें
पति को खिलाएं खीर, बढ़ेगा प्रेम
जीवन में खुशहाली लाने के आसान व अचूक उपाय
ऐसे घर से चली जाती हैं महालक्ष्मी और आ जाती है गरी...
यह सरस्वती मंत्र बोल पाएं भरपूर दिमागी ताकत
काम की रुकावटें दूर करेगा इन असरदार बीज मंत्रों से...
श्री हनुमान के ऐसे ध्यान से छूमंतर हो जाएगा कालसर्...
मेहनत के अच्छे नतीजे नहीं मिल रहे..शनिवार को बोलें...
बीमारियों में बहुत खर्च हो रहा आपका पैसा तो...
गुड़ से मिल जाएगा बहुत पैसा और शोहरत, जानिए उपाय.....
सावन में इस मंत्र से छूएं पीपल..न जेब में होगी तंग...
अगर आप टीबी से पीडि़त हैं तो करें यह उपाय
इस टोटके को करने से होगा धन लाभ
3 काम आज से ही शुरु कर दें...किस्मत कल से ही बदलती...
जेब में रखें पीली कौड़ी, जेब पैसों से रहेगी हमेशा ...
मनचाहे स्थान पर तबादला करवाना है तो यह करें
पति का गुस्सा दूर करें इस उपाय से
एक उपाय- खाली नहीं रहेगा पर्स, घर में आएगा पैसा
इस टोटके से आप भी पा सकते हैं नौकरी
अगर करें ऐसा..फिजूल खर्च होगा कम, घर में आएगी बरकत...
पलंग के नीचे यह सामान रखने से बचें कुंवारे लड़के-ल...
4 को नागपंचमी, इन उपायों से दूर होगा कालसर्प दोष
कौन सा रुद्राक्ष किस मंत्र के साथ धारण करें?
नागपंचमी: कालसर्प दोष के प्रकार व उनका निदान
नागपंचमी पर करें यह टोटका, मिलेगी कालसर्प दोष से म...
कुछ उपाय
संतान प्राप्ति के लिए
बच्चों को वश में करने का अनुभूत मन्त्र प्रयोग
बुधवार को बोलें गणेश की 12 नाम मंत्र स्तुति..हर कद...
अगर सात दिनों में चाहिए कालसर्प और पितृ दोष से मुक...
नागपंचमी: इन मंत्रों से दूर होता है सांपों का डर
नागपंचमी 4 को, कालसर्प दोष दूर करें इन उपायों से
किसी सुहागन महिला या लड़की को खाना खिलाएंगे तो घर ...
मंगलवार और शनिवार को हनुमानजी को ऐसे पूजें, हो जाओ...
totka
अपने प्यार को पाने का टोटका
o ► July (164)
o ► June (216)
o ► May (199)
o ► April (139)
o ► March (128)
o ► February (24)
o ► January (37)
• ► 2010 (226)
My Blog List
• Collation
280 लाख करोड़ का सवाल है ...
1 month ago
•
GHARELU UPAYE SEHAT JAGYE
जानिए संतान और शक्ति पाने के आयुर्वेदिक नुस्खे
4 days ago
• Khanakhajna
आम की बर्फी
2 months ago
•
Rochk jankari
अंधेरे में चमकता है एक कुत्ता
3 days ago Followers
Total Pageviews
192,687
Watermark template. Powered by Blogger.
True Ya False I Dont Know
powered by
Monday, August 8, 2011
क्या आप डिप्रेशन में हैं? यह करें
काम की भागदौड़ में कई बार इंसान डिप्रेशन का शिकार हो जाता है यानी वह मानसिक अवसाद में आ जाता है। ऐसा होना आम बात है लेकिन कई बार डिप्रेशन इतना अधिक बड़ जाता है कि वह कुछ समय के लिए अपनी सुध-बुध खो बैठता है। कुछ लोग डिप्रेशन के कारण पागलपन का शिकार भी हो जाते हैं। यदि आप डिप्रेशन से बचना चाहते हैं तो यह उपाय करें-
प्रतिदिन सुबह नित्य कर्मों से निवृत्त होकर तुलसी के पौधे की 11 परिक्रमा करें और घी का दीपक जलाएं। तुलसी के पौधे को जल चढ़ाएं। यही प्रक्रिया शाम को समय भी करें। ऐसा करने से मानसिक अवसाद कम होगा। तुलसी का माला धारण करें तो और भी बेहतर लाभ मिलेगा।
घर से निकलते समय इस मंत्र का जप करें
जब आप किसी विशेष कार्य के लिए कहीं जाते हैं तो आपके मन में यह शंका अवश्य रहती हैं कि अमुक कार्य में सफलता मिलेगी या नहीं। कार्य में सफलता मिलने में कहीं कोई बाधा तो नहीं होगी। इसके शंका के निवारण के लिए तथा कार्य में सफलता पाने के लिए नीचे लिखे मंत्र का जप करें तो सभी प्रकार की बाधाओं का नाश हो जाता है और कार्य में सफलता अवश्य मिलती है।
मंत्र
राम लक्ष्मणौ सीता च सुग्रीवों हनुमान कपि।
पञ्चैतान स्मरतौ नित्यं महाबाधा प्रमुच्यते।।
जब भी आप घर से किसी विशेष कार्य के लिए बाहर निकलें तो सबसे पहले भगवान श्रीराम के चित्र के समक्ष इस मंत्र का जप मन ही मन में करें। उसके बाद घर से निकलें तो आपके कार्य में कोई बाधा नहीं आएगी और कार्य में सफलता भी मिलेगी।
मनोकामना पूर्ति के अचूक गुप्त उपाय
हर मनुष्य की कुछ मनोकामनाएं होती है। कुछ लोग इन मनोकामनाओं को बता देते हैं तो कुछ नहीं बताते। चाहते सभी हैं कि किसी भी तरह उनकी मनोकामना पूरी हो जाए। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। यदि आप चाहते हैं कि आपकी सोची हर मुराद पूरी हो जाए तो नीचे लिखे प्रयोग करें। इन टोटकों को करने से आपकी हर मनोकामना पूरी हो जाएगी।
उपाय
- तुलसी के पौधे को प्रतिदिन जल चढ़ाएं तथा गाय के घी का दीपक लगाएं।
- रविवार को पुष्य नक्षत्र में श्वेत आक की जड़ लाकर उससे श्रीगणेश की प्रतिमा बनाएं फिर उन्हें खीर का भोग लगाएं। लाल कनेर के फूल तथा चंदन आदि के उनकी पूजा करें। तत्पश्चात गणेशजी के बीज मंत्र (ऊँ गं) के अंत में नम: शब्द जोड़कर 108 बार जप करें।
- सुबह गौरी-शंकर रुद्राक्ष शिवजी के मंदिर में चढ़ाएं।
- सुबह बेल पत्र (बिल्ब) पर सफेद चंदन की बिंदी लगाकर मनोरथ बोलकर शिवलिंग पर अर्पित करें।
- बड़ के पत्ते पर मनोकामना लिखकर बहते जल में प्रवाहित करने से भी मनोरथ पूर्ति होती है। मनोकामना किसी भी भाषा में लिख सकते हैं।
- नए सूती लाल कपड़े में जटावाला नारियल बांधकर बहते जल में प्रवाहित करने से भी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।
इन प्रयोगों को करने से आपकी सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूरी हो जाएंगी।
Posted by ज्योतिष विद्या at 10:36 PM 0 comments
Email This BlogThis! Share to Twitter Share to Facebook Share to Google Buzz
Labels: उपाय
बिजनेस, प्यार, दोस्ती...ऐसे नाम वालों से रहें सावधान
ज्योतिष में 12 राशियों को उनके स्वभाव, प्रकृति, तत्व और गुणों के आधार पर बांटा गया है। सभी लोगों पर अपनी अपनी राशियों का प्रभाव होता है। राशियों की प्रकृति और स्वभाव के अनुसार सभी लोगों पर इसका असर भी पड़ता है। ज्योतिष में राशियों की प्रकृति और स्वभाव तीन तरह के बताए गए हैं। चर, स्थिर और द्विस्वभाव।
जिन लोगों की राशि की प्रकृति द्विस्वभाव होती है ऐसे लोगों से बिजनेस, प्यार, दोस्ती और अन्य क्षेत्रों में सावधान रहना चाहिए क्योंकि ऐसे लोग अपनी राशि के प्रभाव से विश्वास करने योग्य नही होते। द्विस्वभाव राशि के लोग अचानक अपना निर्णय बदल देते हैं।
कैसे नाम वालों से रहें सावधान-
मिथुन ( का की कु घ ड़ छ के को हा)- जिन लोगों का नाम इन अक्षरों से शुरु होता है उनकी राशि मिथुन और राशि स्वामी बुध होता है। बुध को ज्योतिष में बुद्धि का कारक ग्रह माना गया है। मिथुन राशि वाले बुध के प्रभाव से किसी निर्णय पर स्थिर नही रह सकते।
कन्या-( टो पा पी पू ष ण ठ पे पो)- इन अक्षरों के नाम वालों की राशि कन्या होती है और इस राशि का भी स्वामी बुध है। बुध को ज्योतिष में वाणी का कारक ग्रह माना जाता है। इस राशि के लोगों के दिमाग में हमेशा दो बातें चालती रहती है। यह बोलते कुछ और है, करते कुछ और है।
धनु- (ये यो भा भी भू धा फा ढ़ा भे)- जिन लोगों का नाम इन अक्षरों से शुरु होता है उनकी धनु राशि होती है। गुरु और चंद्रमा के प्रभाव से इस राशि के लोग द्विस्वभाव वाले होते हैं यनि समय आने पर अपना फायदा देखकर बदल जाने वाले होते हैं।
मीन- (दी दू थ झ ञ दे दो चा ची )- इस राशि वालों का फल भी धनु राशि वालों की तरह होता है।
हनुमानजी को चढ़ाएं ये तीन लाल चीजें, हो जाएंगे सब काम
पूजन-कर्म की शक्तियों से सभी भलीभांति परिचित हैं। जीवन की सभी परेशानियों से निजात पाने के लिए इससे अच्छा दूसरा कोई और विकल्प नहीं है। सुख और दुख जीवन के दो पहलु हैं। हमें सुख मिलेगा या दुख यह हमारे कर्मों के आधार पर ही निर्धारित होता है।
यदि किसी व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक दुख या परेशानियां चल रही हैं तो हनुमानजी की विधिवत पूजा करें। हर मंगलवार और शनिवार को बजरंग बली को विशेष वस्तुएं अर्पित करें। इनमें तीन लाल रंग की ये वस्तुएं शामिल हैं- लाल फूल, लाल वस्त्र और लाल फल।
ये तीनों लाल चीजें हनुमानजी को अतिप्रिय मानी गई हैं। यह बजरंगबली को अर्पित करने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सभी मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त प्रतिदिन हनुमान चालिसा का पाठ करें। इससे दिनभर मन शांत रहेगा और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
मोर पंख का प्रयोग
पक्षी शास्त्र में महत्त्व
जैसे उल्लूक तन्त्रं के ग्रन्थ में उल्लुओं का.....काक तन्त्रं नाम के ग्रन्थ में कौवे का महत्त्व दिया गया है उसी प्रकार देववाहिनी तन्त्रं में मोर....मोनाल और जुजुराना जैसे पक्षियों के पंखों का विवरण दिया गया है.....
बिभिन्न लाभ
वशीकरण...कार्यसिद्धि....भूत बाधा....रोग मुक्ति.....ग्रह वाधा....वास्तुदोष निग्रह आदि में बहुत ही महत्पूरण माना गया हैं...
सर पर धारण करने से विद्या लाभ मिलता है या सरस्वती माता के उपासक और विद्यार्थी पुस्तकों के मध्य अभिमंत्रित मोर पंख रख कर लाभ उठा सकते हैं.....मंत्र सिद्धि के लिए जपने वाली माला को मोर पंखों के बीच रखा जाता हैं....घर में अलग अलग स्थान पर मोर पंख रखने से घर का वास्तु बदला जा सकता है...नव ग्रहों की दशा से बचने के लिए भी होता है मोर पंख का प्रयोग......कक्ष में मोर पंख वातावरण को सकारात्मक बनाने में लाभदायक होता है......भूत प्रेत कि बाधा दूर होती है.....
ग्रह बाधा से मुक्ति
यदि आप पर कोई ग्रह अनिष्ट प्रभाव ले कर आया हो....आपको मंगल शनि या राहु केतु बार बार परेशान करते हों तो मोर पंख को 21 बार मंत्र सहित पानी के छीटे दीजिये और घर में वाहन में गद्दी पर स्थापित कीजिये...कुछ प्रयोग निम्न हैं
सूर्य की दशा से मुक्ति
रविवार के दिन नौ मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे रक्तबर्ण मेरून रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ नौ सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ सूर्याय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
दो नारियल सूर्य भगवान् को अर्पित करें
लड्डुओं का प्रसाद चढ़ाएं
चंद्रमा की दशा से मुक्ति
सोमवार के दिन आठ मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे सफेद रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ आठ सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ सोमाय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
पांच पान के पत्ते चंद्रमा को अर्पित करें
बर्फी का प्रसाद चढ़ाएं
मंगल की दशा से मुक्ति
मंगलवार के दिन सात मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे लाल रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ सात सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ भू पुत्राय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
दो पीपल के पत्तों पर अक्षत रख कर मंगल ग्रह को अर्पित करें
बूंदी का प्रसाद चढ़ाएं
बुद्ध की दशा से मुक्ति
बुद्धबार के दिन छ: मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे हरे रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ छ: सुपारियाँ रखे
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ बुधाय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
जामुन अथवा बेरिया बुद्ध ग्रह को अर्पित करें
केले के पत्ते पर मीठी रोटी का प्रसाद चढ़ाएं
बृहस्पति की दशा से मुक्ति
बीरवार के दिन पांच मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे पीले रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ पांच सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ ब्रहस्पते नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
ग्यारह केले बृहस्पति देवता को अर्पित करें
बेसन का प्रसाद बना कर चढ़ाएं
.
शुक्र की दशा से मुक्ति
शुक्रवार के दिन चार मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे गुलाबी रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ चार सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ शुक्राय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
तीन मीठे पान शुक्र देवता को अर्पित करें
गुड चने का प्रसाद बना कर चढ़ाएं
शनि की दशा से मुक्ति
शनिवार के दिन तीन मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे काले रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ तीन सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ शनैश्वराय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
तीन मिटटी के दिये तेल सहित शनि देवता को अर्पित करें
गुलाबजामुन या प्रसाद बना कर चढ़ाएं
राहु की दशा से मुक्ति
शनिवार के दिन सूर्य उदय से पूर्व दो मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे भूरे रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंखों के साथ दो सुपारियाँ रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ राहवे नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
चौमुखा दिया जला कर राहु को अर्पित करें
कोई भी मीठा प्रसाद बना कर चढ़ाएं
केतु की दशा से मुक्ति
शनिवार के दिन सूर्य अस्त होने के बाद एक मोर पंख ले कर आयें
पंख के नीचे स्लेटी रंग का धागा बाँध लेँ
एक थाली में पंख के साथ एक सुपारी रखें
गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार ये मंत्र पढ़ें
ॐ केतवे नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
पानी के दो कलश भर कर राहु को अर्पित करें
फलों का प्रसाद चढ़ाएं
वास्तु में सुधार
घर का द्वार यदि वास्तु के विरुद्ध हो तो द्वार पर तीन मोर पंख स्थापित करें , मंत्र से अभिमंत्रित कर पंख के नीचे गणपति भगवान का चित्र या छोटी प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए
मंत्र है-ॐ द्वारपालाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:
यदि पूजा का स्थान वास्तु के विपरीत है तो पूजा स्थान को इच्छानुसार मोर पंखों से सजाएँ, सभी मोर पंखो को कुमकुम का तिलक करें व शिवलिं की स्थापना करें पूजा घर का दोष मिट जाएगा, प्रस्तुत मंत्र से मोर पंखों को अभी मंत्रित करें
मंत्र है-ॐ कूर्म पुरुषाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:
यदि रसोईघर वास्तु के अनुसार न बना हो तो दो मोर पंख रसोईघर में स्थापित करें, ध्यान रखें की भोजन बनाने वाले स्थान से दूर हो, दोनों पंखों के नीचे मौली बाँध लेँ, और गंगाजल से अभिमंत्रित करें
मंत्र-ॐ अन्नपूर्णाय नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:
और यदि शयन कक्ष वास्तु अनुसार न हो तो शैय्या के सात मोर पंखों के गुच्छे स्थापित करें, मौली के साथ कौड़ियाँ बाँध कर पंखों के मध्य भाग में सजाएं, सिराहने की और ही स्थापित करें, स्थापना का मंत्र है
मंत्र-ॐ स्वप्नेश्वरी देव्यै नम: जाग्रय स्थापय स्वाहा:
Posted by ज्योतिष विद्या at 2:48 AM 0 comments
Email This BlogThis! Share to Twitter Share to Facebook Share to Google Buzz
Labels: उपाय, वास्तु
वास्तु दोष निवारक महायंत्र
वास्तु दोष निवारक महायंत्र
यदि आप ऐसी हालत में भी नहीं हैं कि पूजा पाठ या मंत्र का जाप कर सकें और आप नकारात्मक वास्तु के कारण बेहद परेशान है
घर दूकान या आफिस को बिना तोड़े फोड़े सुधारना चाहते हैं तो उसका दिव्य उपाय है महायंत्र
वास्तु का तीब्र प्रभावी यन्त्र
----------------------------------
121 177 944
----------------------------------
533 291 311
----------------------------------
657 111 312
----------------------------------
यन्त्र को आप सादे कागज़ भोजपत्र या ताम्बे चाँदी अष्टधातु पर बनवा सकते हैं
यन्त्र के बन जाने पर यन्त्र की प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिए
प्राण प्रतिष्ठा के लिए पुष्प धूप दीप अक्षत आदि ले कर यन्त्र को अर्पित करें
पंचामृत से सनान कराते हुये या छींटे देते हुये 21 बार मंत्र का उच्चारण करें
मंत्र-ॐ आं ह्रीं क्रों कूर्मासनाय नम:
अब पीले रंग या भगवे रंग के वस्त्र में लपेट कर इस यन्त्र को घर दूकान या कार्यालय में स्थापित कर दीजिये
पुष्प माला अवश्य अर्पित करें
इस प्रयोग से एक बार में ही वास्तु दोष हट जाएगा
कूर्म चिन्ह के सरल टोटके
चांदी के गिलास बर्तन या पात्र पर कछुए का चिन्ह बना कर भोजन करने व पानी पीने से भारी से भारी तनाब नष्ट होता है
चार पायी बेड अथवा शयन कक्ष में धातु का कूर्म अर्थात कछुआ रखने से गहरी और सुखद निद्रा आती है जो स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी होती है
पूजा के स्थान पर ऐसा श्रीयंत्र स्थापित करें जो कछुए की पीठ पर बना हो इससे घर में सुख शान्ति के साथ साथ धन एवं अच्छे संस्कार आते हैं
रसोई घर में कूर्म की स्थापना करने से वहां पकने वाला
भोजन रोगमुक्ति के गुण लिए भक्त को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाता है
यदि नया भवन बना रहे हैं तो आधार में चाँदी का कछुआ ड़ाल देने से घर में रहने वाला परिवार खूब फलता-फूलता है
बच्चों को विद्या लाभ व राजकीय लाभ मिले इसके लिए उनसे कूर्म की उपासना करवानी चाहिए तथा मिटटी के कछुए उनके कक्ष में स्थापित करें
यदि आपका घर किसी विवाद में पड़ गया हो या घर का संपत्ति का विवाद कोर्ट कचहरी तक पहुँच गया हो तो लोहे का कूर्म बना कर शनि मंदिर में दान करना चाहिए
घर की छत में कूर्म की स्थापना से शत्रु नाश होता है
राशि अनुसार किस रंग का कूर्म देगा धन लाभ
यदि आप व्यापारी है, नौकरी पेशेवाले है, अपना कोई काम करते हैं और धन लाभ प्राप्त ही नहीं कर पाते,
आपका व्यवसाय नौकरी स्थायी नहीं है धन लाभ हो नहीं पाता या होते होते बंद हो जाता है तो
आपको पूजा स्थान में अपनी राशी के अनुसार धनप्रदा कूर्म की स्थापना करनी चाहिए
आइये राशिबार जानते है धनप्रदा कूर्म के बारे में
मेष राशि के जातकों को धनलाभ के लिए सुनहरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 7 का अंक लिख दें
बृष राशि के जातकों को धनलाभ के लिए हरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 3 का अंक लिख दें
मिथुन राशि के जातकों को धनलाभ के लिए मटमैले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 9 का अंक लिख दें
कर्क राशि के जातकों को धनलाभ के लिए आसमानी रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 5 का अंक लिख दें
सिंह राशि के जातकों को धनलाभ के लिए लाल रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 2 का अंक लिख दें
कन्या राशि के जातकों को धनलाभ के लिए भूरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 6 का अंक लिख दें
तुला राशि के जातकों को धनलाभ के लिए पीले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 7 का अंक लिख दें
बृश्चिक राशि के जातकों को धनलाभ के लिए नीले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 4 का अंक लिख दें
धनु राशि के जातकों को धनलाभ के लिए हरे रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 1 का अंक लिख दें
मकर राशि के जातकों को धनलाभ के लिए जमुनी रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 6 का अंक लिख दें
कुम्भ राशि के जातकों को धनलाभ के लिए काले रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 8 का अंक लिख दें
मीन राशि के जातकों को धनलाभ के लिए सफेद रंग का मिटटी या धातु का कछुया पूजा स्थान पर स्थापित करना चाहिए जिसके नीचे आप 5 का अंक लिख दें
इस मंत्र जप से मिलेगी रोगों से मुक्ति
वर्तमान में जिस तरह का जीवन हम जी रहे हैं उससे कारण अनेक प्रकार की बीमारियां होने के खतरा काफी बढ़ गया है। हालांकि बीमारियों का इलाज अब बहुत सुलभ हो चुका है लेकिन यदि नीचे लिखे मंत्र का जप प्रतिदिन विधि-विधान से किया जाए तो बीमारी होने की संभावना काफी कम हो जाती है और यदि कोई रोग इस मंत्र का जप करें तो उसकी बीमारी शीघ्र ही ठीक हो जाती है। मंत्र इस प्रकार है-
मंत्र
आत्यन्तिकं व्याधिहरं जनानां चिकित्सिकं वेदविदो वदन्ति।
संसारतापत्रयनाशबीजं गोविन्दं दामोदर माधवेति।।
अर्थात: गोविंद, दामोदर माधव यह तीन नाम का जाप समस्त रोगों का नाश कर देता है तथा संसार के त्रिविध तापों का नाश करने वाला है।
जप विधि
- प्रतिदिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों से निवृत्त होकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें।
- पूर्व दिशा की ओर मुख करके तुलसी की माला से इस मंत्र की कम से कम एक माला जप रोज करें।
- मंत्र जप के समय बैठने के लिए कुश के आसन का उपयोग करें।
- मंत्र जप का समय, आसन व माला एक हो तो मंत्र शीघ्र ही सिद्धि हो जाएगा।
नींद नहीं आती? तो यह टोटका करें
नींद न आना आज-कल एक आम समस्या हो गई है। भागदौड़ भरी जिंदगी में हर समय किसी न किसी बात की चिंता होना इसका प्रमुख कारण है। इसके कारण वह चैन की नींद भी नहीं सो पाता। यदि आपके साथ भी यही समस्या है तो यह टोटका करें-
टोटका
जब आप सोने जाएं तो बिस्तर पर लेटने के बाद शरीर को थोड़ी देर के लिए ढीला छोड़ दें और धीरे-धीरे 100 तक गिनती गिनें। उसके बाद सांस रोककर ऊँ कुंभ कर्णाय नम: बोलें और सांस छोड़ दें। इस तरह 108 बार करें। कुछ दिनों तक थोड़ी समस्या होगी लेकिन बाद में आपकी समस्या का निदान हो जाएगा और आपके भरपूर नींद आने लगेगी।
पति को खिलाएं खीर, बढ़ेगा प्रेम
अगर आपके दाम्पत्य जीवन में पहले जैसी मधुरता नहीं रही या फिर रोज किसी न किसी बात पर पति-पत्नी के बीच झगड़े होते हों तो समझ लीजिए कि आपके दाम्पत्य जीवन में प्रेम का अभाव हो गया है। इस प्रेम को बढ़ाने के लिए एक छोटा मगर असरदार उपाय इस प्रकार है-
उपाय
शुक्ल पक्ष में पडऩे वाले किसी शुक्रवार के दिन पत्नी अपने हाथों से प्रेम पूर्वक साबूदाने की खीर बनाएं लेकिन उसमें शक्कर के स्थान पर मिश्री डालें। इस खीर को सबसे पहले भगवान को अर्पित करें और इसके बाद पति-पत्नी थोड़ी-थोड़ी एक-दूसरे को खिलाएं। भगवान से सुखमय दाम्पत्य की कामना करें। इस दिन किसी लक्ष्मी मंदिर में जाकर इत्र का दान करें। अपने शयनकक्ष में इत्र कदापि न रखें। कुछ दिनों तक यह प्रयोग करते रहें । कुछ ही दिनों में दाम्पत्य जीवन सुखी हो जाएगा।
जीवन में खुशहाली लाने के आसान व अचूक उपाय
सभी चाहते हैं कि उसके जीवन में खुशहाली रहे और सुख-शांति बनी रहे पर हर व्यक्ति के साथ ऐसा नहीं होता। जीवन में सुख और शांति का बना रहना काफी मुश्किल होता है। ऐसे समय में उसे अपना जीवन नरक लगने लगता है। यदि आपके साथ भी यही समस्या है तो आप नीचे लिखे साधारण उपायों को अपनाकर अपने जीवन को खुशहाल बना सकते हैं। यह उपाय इस प्रकार हैं-
- सुबह घर से काम के लिए निकलने से पहले नियमित रूप से गाय को रोटी दें।
- एक पात्र में जल लेकर उसमें कुंकुम डालकर बरगद के वृक्ष पर नियमित रूप से चढ़ाएं।
- सुबह घर से निकलने से पहले घर के सभी सदस्य अपने माथे पर चन्दन तिलक लगाएं।
- मछलियों की आटे की गोली बनाकर खिलाएं।
- चींटियों को खोपरे व शकर का बूरा मिलाकर खिलाएं।
- शुद्ध कस्तूरी को चमकीले पीले कपड़े में लपेटकर अपनी तिजोरी में रखें।
इन उपायों को पूर्ण श्रद्धा के साथ करने से जीवन में समृद्धी व खुशहाली आने लगती है।
ऐसे घर से चली जाती हैं महालक्ष्मी और आ जाती है गरीबी
जिस व्यक्ति के घर का सामान हमेशा बिखरा रहता है उसे कई मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक तनाव, परेशानियां झेलना पड़ती है। फेंगशुई और वास्तु की मान्यता है कि घर का सामान हमेशा व्यवस्थित और साफ-स्वच्छ होना चाहिए।
वास्तु के अनुसार कमरे में बिखरी वस्तुएं सबसे अधिक नेगेटिव प्रभाव देती है। बिखरा सामान घर की सभी पॉजीटिव एनर्जी को नष्ट कर देता है। बुरे प्रभाव को बढ़ा देता है। इसका प्रभाव घर में रहने वाले सभी सदस्यों के रिश्ते पर भी पड़ता है। बिखरे सामान की तरह रिश्ते भी बिखर जाते हैं, सभी को मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। मन-मुटाव बढ़ जाता है। साथ ही परिवार में धन संबंधी परेशानियां भी खड़ी हो जाती हैं। जिस घर का सामान व्यवस्थित नहीं होता वहां से धन की देवी महालक्ष्मी चली जाती है और दरिद्रता अपने पैर पसार लेती है। ऐसे घर में निर्धनता बढ़ती है। इससे हमारे स्वास्थ्य को भी कई के दुष्प्रभावों का सामना करना पड़ता है। घर में धूल-मिट्टी और गंदगी बढ़ जाती है।
वास्तु के अनुसार कमरे में रखी गयी सभी चीजें अच्छे से रखना चाहिए जिससे घर की सुंदरता बढ़े। जहां घर को अच्छे से सजाकर रखा जाता है वहां सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। धन संबंधी समस्याएं भी वहां नहीं आती। परिवार के सभी सदस्यों के रिश्तों में प्रेम बढ़ता है।
यह सरस्वती मंत्र बोल पाएं भरपूर दिमागी ताकत
विघ्र व बाधा मुक्त जीवन के लिये शक्ति व धन के साथ बुद्धि अहम होती है। हिन्दू धर्म मान्यताओं के मुताबिक देवी शक्ति के तीन रूप महादुर्गा, महासरस्वती और महालक्ष्मी ऐसी ही सबलता प्रदान करते हैं। जिनमें महासरस्वती की उपासना बुद्धि को पावन, विवेकशील, दूरदर्शी बनाने वाली मानी गई है। सार रूप में समझें तो माता सरस्वती का ध्यान दिमागी तौर पर सबल बनाता है।
धर्मशास्त्रों में माता सरस्वती की उपासना पंचमी तिथि पर बहुत ही शुभ होती है। जिनमें बसंत पंचमी खासतौर पर प्रसिद्ध है। इसी कड़ी में नागपंचमी पर भी माता सरस्वती की उपासना मन और मस्तिष्क की सारी कमजोरियों को दूर कर बलवान बनाने वाली मानी गई है।
इस दिन माता सरस्वती उपासना के लिये सरस्वती ध्यान मंत्र के साथ असरदार सरस्वती गायत्री मंत्र के स्मरण का महत्व है। जानते हैं माता सरस्वती की उपासना व विशेष मंत्र-
- देवालय या घर में माता सरस्वती की प्रतिमा या तस्वीर की पूजा में पीला या सफेद चंदन, पीले अक्षत, पीले फूल अर्पित करें। सुगंधित धूप व दीप जलाएं। नीचे लिखें मंत्र से माता सरस्वती का ध्यान करें -
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
मंत्र ध्यान के बाद इस शक्तिशाली सरस्वती गायत्री मंत्र का यथाशक्ति जप करें, कम से कम 108 बार बोलना मंगलकारी माना गया है -
ॐ सरस्वत्यै विद्महे।
ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि।
तन्नो देवी प्रचोदयात्।
काम की रुकावटें दूर करेगा इन असरदार बीज मंत्रों से शिव ध्यान
सावन माह में बारिश के मौसम में हरियाली और हवा तन को तो इस सुहाने मौसम में शिव भक्ति तन के साथ ही मन को गहरा सुकून, सुख व ऊर्जा देती है। शिव उपासना के अनेक उपायों में शिव मंत्र स्तुति और स्त्रोतों का पाठ शिव भक्ति के आनंद को बढ़ा देता है।
शिव की हर मंत्र स्तुतियां अनेक तरह की मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी गई है। इनमें से कुछ मंत्र स्तुतियां तो इतनी चमत्कारी मानी गई है कि जिनका पाठ विशेष करना ही नहीं सुनना भी शीघ्र ही असंभव लगने वाली इच्छाओं को पूरा कर देता है। खास तौर पर यह तब और असरदार हो जाती है, जब कुछ विशेष बीज मंत्रों के साथ इस मंत्र स्तुति को बोला जाए।
भगवान शिव की ऐसी ही एक मंत्र स्तुति है- शिव महिम्र स्त्रोत। शिव के दिव्य स्वरूप व अपार शक्तियों की महिमा का गान करता यह स्त्रोत नीचे बताए कुछ विशेष मंत्रों के साथ नागपंचमी के अवसर पर जरूर करें। यह कार्य में आ रही सारी अड़चनों को दूर कर देगा-
- नाग पंचमी के दिन शिव व नाग या चांदी से बने नाग की पंचोपचार पूजा में गंध, अक्षत, सफेद फूल, प्रसाद चढ़ाकर शिव महिम्र स्त्रोत का पाठ करें।
- इस स्त्रोत का पाठ करते वक्त विशेष तौर पर नीचे लिखें बीज मंत्रों को शिव महिम्र स्त्रोत के मंत्रों के आगे और पीछे लगाकर बोलें। आगे सीधे व पीछे इन बीज मंत्रों को उल्टी तरफ से बोलें। जिसे लोम-विलोम पाठ भी पुकारा जाता है। ये मंत्र हैं -
ऐ ह्रीं श्रीं हों जूं स:
- जानकारी न होने पर किसी विद्वान ब्राह्मण से इस स्त्रोत का पाठ करें, जो स्वयं करने भी अधिक पुण्यदायी और कामनापूर्ति में शीघ्र फलदायी माना गया है।
श्री हनुमान के ऐसे ध्यान से छूमंतर हो जाएगा कालसर्प दोष
हिन्दू धर्म शास्त्रों के मुताबिक सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी यानी नागपंचमी (4 अगस्त) कालसर्प योग से मिल रही बाधा, पीड़ा के शमन का अचूक काल है। ज्योतिष शास्त्रों के मुताबिक राहु और केतु के बीच अन्य ग्रहों के आने से बने इस योग के बुरे असर से इंसान को कदम-कदम पर जूझना पड़ता है। उसकी मेहनत का पूरा फल प्राप्त नहीं होता, सुखों से वंचित रहता है। वहीं अच्छा प्रभाव संघर्ष के बाद फर्श से अर्श तक पहुंचा भी सकता है।
चूंकि नाग को काल का प्रतीक माना गया है। शिव काल के नियंत्रक देवता और शिव के अवतार श्री हनुमान काल के कुचक्र से छुटकारा देकर हर सुख प्रदान करने वाले देवता के रूप में पूजनीय है। इसलिए नागपंचमी के अवसर पर नाग पूजा के साथ शिव और हनुमान की स्तुति कालसर्प दोष से रक्षा का श्रेष्ठ और आसान उपाय माना गया है।
इन उपायों में एक है शिव की सेवा और भक्ति भाव से ओतप्रोत शिव महिम्र स्त्रोत के साथ हनुमान चालीसा का पाठ। धार्मिक महत्व के नजरिए से इस उपाय को अपनाने से शिव व हनुमान कृपा से दरिद्रता, रोग, शत्रु पीड़ा का नाश होकर कामनापूर्ति और धन प्राप्ति होती है। जानते हैं इस पाठ का तरीका और शिव महिम्र स्त्रोत -
- स्नान के बाद शिवालय में शिव का पंचामृत स्नान, पंचोपचार पूजा के बाद शिव महिम्र स्त्रोत का पाठ करें। जानकारी न होने पर किसी विद्वान ब्राह्मण से इस स्त्रोत का पाठ कराएं। ब्राह्मण को दान-दक्षिणा दोहरा पुण्य लाभ भी देती है।
- किंतु कालसर्प दोष की शांति के लिये विशेष रूप से शिव महिम्र स्त्रोत पाठ करने से पहले श्री गणेश का ध्यान करें और बाद हनुमान चालीसा का पाठ करें।
- श्री हनुमान चालीसा का पाठ इस स्त्रोत पाठ के बाद भी करें।
- अंत में इच्छापूर्ति और कष्ट निवारण की प्रार्थना कर शिव और हनुमान की विधिवत् आरती करें।
- शिव और हनुमान के ऐसे ध्यान से न केवल जीवन से जुड़ी हर कामना पूरी होती है बल्कि तमाम कष्ट, परेशानियां और मुश्किलों से छुटकारा मिल जाता है।
मेहनत के अच्छे नतीजे नहीं मिल रहे..शनिवार को बोलें यह कृष्ण मंत्र
इंसान व्यक्तिगत जीवन के साथ परिवार की सुख-समृद्धि या कार्यक्षेत्र में उन्नति या प्रगति के लिये कड़ी मेहनत करता है। किंतु वक्त के उतार-चढ़ाव के चलते हमेशा मनचाहे नतीजे नहीं मिलते। कभी-कभी यह सिलसिला लंबा चलता है, जो किसी भी इंसान के लिए परीक्षा की घड़ी होती है। जिसमें धैर्य ही सफलता दिलाता है।
हिन्दू धर्मशास्त्रों में ऐसे वक्त और स्थिति के पीछे कालसर्प दोष को भी कारण माना जाता है। जन्मकुण्डली में छायाग्रहों राहु व केतु के बीच अन्य ग्रहों के आने से बनने वाला यह योग अन्य ग्रहों के बुरे प्रभाव से मानसिक, शारीरिक या व्यावहारिक परेशानियां देने वाला माना गया है।
इन विघ्र और बाधाओं से पार पाने के लिए एक बड़ा ही आसान उपाय शास्त्रों में बताया गया है। यह है भगवान श्री कृष्ण का स्मरण। भगवान श्रीकृष्ण के कालिया नाग के मर्दन के प्रसिद्ध प्रसंग में भी साहस और मेहनत द्वारा विघ्र और बाधाओं के शमन का संदेश है। इसलिए कृष्ण भक्ति कालसर्प दोष शांति के साथ सुखद नतीजे भी देती है।
भगवान श्री कृष्ण विष्णु अवतार हैं। शनिवार श्रीकृष्ण भक्त शनि भक्ति के साथ राहु-केतु की उपासना का भी होता है। इसलिए शनिवार को विष्णु अवतार श्रीकृष्ण का नीचे लिखे प्रचलित और आसान महामंत्रों का जप श्रीकृष्ण की सामान्य पंचोपचार पूजा के बाद किया जाना बहुत ही शुभ माना गया है।
- प्रात: स्नान के बाद घर में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को जल व पंचामृत से स्नान के बाद केसरयुक्त चंदन, अक्षत, फूल, पीताम्बरी वस्त्र अर्पित कर माखन-मिश्री का भोग लगाएं और नीचे लिखे दो मंत्रों का विषम संख्या यानी 1, 2, 5, 7, 11, 21 बार जप करें। एक माला यानी 108 बार जप श्रेष्ठ माना गया है -
- कृं कृष्णाय नम:
- ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
इन मंत्रों के जप के बाद भगवान श्रीकृष्ण व भगवान विष्णु की आरती करें और अपार सफलता की कामना करें ।
बीमारियों में बहुत खर्च हो रहा आपका पैसा तो...
आजकल असंयमित खान-पान और अव्यवस्थित दिनचर्या के चलते काफी लोगों अक्सर बीमार ही रहते हैं। इसके साथ ही लगातार बढ़ते प्रदूषण के कारण छोटी-छोटी बीमारियां भी लंबे समय तक ठीक नहीं हो पाती।
ऐसे में काफी पैसा बीमारी को दूर करने में खर्च हो जाता है। बीमारियों से बचने के लिए हमें खानपान के साथ व्यवस्थित दिनचर्या का भी ध्यान रखना होगा। इसके अलावा ज्योतिष के अनुसार भी कुछ टिप्स बताए गए हैं जिनसे बीमारियों से निजात मिलेगी और इन खर्चों में कमी आएगी।
पैसा कमाने की होड़ में व्यक्ति अक्सर कुछ धार्मिक कर्तव्य भूल जाता है। इन्हीं कर्तव्यों में से एक है गरीब, निसहाय लोगों को दान देना, उनकी मदद करना। सभी धर्मों में असहाय लोगों की मदद करना हमारा मुख्य कर्तव्य बताया गया है। जिसका पालन होना बहुत आवश्यक है। ऐसे लोगों की मदद करने से समाज का कल्याण होगा और दानदाता को धार्मिक लाभ भी प्राप्त होता है।
सुपात्र को दान करने से कुंडली के कई ग्रह दोष स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं और देवी-देवताओं की कृपा भी प्राप्त होती है। भगवान की कृपा के साथ ही बीमारियों आदि से हमारा बचाव हो जाता है। इसीलिए एक महीने में कम से कम एक बार किसी गरीब को खाना खिलाएं और कपड़े आदि का दान करें। उसकी दुआओं से आपकी या आपके परिवार के किसी सदस्य की बीमारियों का प्रभाव कम हो जाएगा।
गुड़ से मिल जाएगा बहुत पैसा और शोहरत, जानिए उपाय...
आज खाने की चीजों को मीठा करने के लिए शकर का उपयोग किया जाता है लेकिन पुराने समय में गुड़ से खाने को मीठा किया जाता था। इसी वजह से भगवान को गुड़ से निर्मित चीजों का मीठा प्रसाद चढ़ाया जाता था। शास्त्रों के अनुसार सभी देवी-देवताओं को मीठा प्रसाद या भोग प्रिय बताया गया है।
ऐसा माना जाता है कि देवी-देवताओं को गुड़ चढ़ाने से वे जल्द ही प्रसन्न होते हैं और श्रद्धालु को सभी इच्छित वस्तुएं प्रदान करते हैं। हनुमानजी कलयुग में सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं। बजरंगबली अपने भक्तों बल, बुद्धि और विद्या प्रदान करते हैं जिससे वे सुख-समृद्धि की वस्तुएं अर्जित कर सकते हैं। हनुमानजी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें प्रतिदिन सुबह-सुबह गुड़ का भोग लगाना चाहिए। इसके साथ ही हनुमान चालिसा का पाठ करने के बाद ही कार्य प्रारंभ करना चाहिए। ऐसा करने पर बहुत ही कम दिनों में आपकी सभी परेशानियां स्वत: ही दूर हो जाती हैं और धन प्राप्ति के नए मार्ग खुल जाते हैं। इस उपाय के साथ ही यह भी ध्यान रखें कि किसी भी अधार्मिक से सदैव दूर रहें और घर के वृद्धजनों का सम्मान करें। अन्यथा यह उपाय अपना पूरा प्रभाव नहीं दे पाएगा।
सावन में इस मंत्र से छूएं पीपल..न जेब में होगी तंगी, न घर में तनातनी
वक्त यानी काल की मार सबल को भी बेबस कर सकती है। जिसमें इंसान को तन, मन या धन की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय में अपनों का प्रेम और सहयोग ही सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। किंतु अनेक अवसरों पर ऐसे समय में संयम की कमी परिवार में कलह और तंगहाली के हालात भी पैदा करते हैं।
इस समस्या के व्यावहारिक हल के लिऐ धर्मशास्त्रों में अच्छे-बुरे दोनों ही समय में अहं को दूर रख जीवन बिताना जरूरी माना गया है। जिससे खासतौर से बुरे समय में परिजनों व मित्रों का सहारा मिल सके। किंतु धार्मिक उपायों में काल के नियंत्रक भगवान शिव की भक्ति श्रेष्ठ मानी गई है।
शिव भक्ति ऐसे ही विपरीत समय में जीवन की नैय्या को पार लगाने वाली मानी गई है। सावन माह में शिव उपासना मनचाहे फल देती है। इसलिए यहां बताया जा रहा है शिव कृपा से धन-धान्य और कलहमुक्त जीवन जीने के लिए एक ऐसा सरल उपाय, जिसे आप चलते-फिरते दिन में किसी भी वक्त अपनाएं तो बहुत ही लाभ प्राप्त होगा। इससे ग्रह दोष शांति भी होगी।
यह उपाय है - देव वृक्ष पीपल को विशेष मंत्र से छूकर शिव का ध्यान व पीपल की जड़ में दूध व काले तिल मिले जल का अर्पण। चूंकि पीपल वृक्ष में भगवान शिव का वास भी माना गया है। इसलिए कष्ट निवारण और दरिद्रता के शमन का यह अचूक उपाय माना गया है - जानें यह मंत्र और विधि -
- सावन माह में खासतौर पर अष्टमी, सोमवार, चतुर्दशी के दिन स्नान कर सफेद वस्त्र धारण करें।
- समीप स्थित किसी पीपल वृक्ष खासतौर पर देवालय के पीपल वृक्ष को प्रणाम कर गंध, अक्षत, फूल अर्पित करें।
- पूजा सामग्री अर्पित कर नीचे लिखें मंत्रों से पीपल को छूएं और शिव का स्मरण कर जल व तिल मिला जल पीपल की जड़ में चढ़ाएं -
पीपल छूने का मंत्र -
नेत्रस्पन्दादिजं दु:खं दु:स्वप्रं दुर्विचिन्तनम्।
शक्तानां च समुद्योगमश्र्वत्थ त्वं क्षमस्व मे।।
शिव मंत्र -
ॐ शर्वाय नम: (शर्व यानी कष्ट को हरने वाले)
- मंत्र स्मरण व जल अर्पण के बाद मिठाई का भोग लगा धूप, दीप से शिव आरती कर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक कष्टों को हरने की विनती भगवान शिव से मन ही मन करें। पीपल में चढ़ाया थोड़ा सा जल घर में लाकर छिड़कें।
अगर आप टीबी से पीडि़त हैं तो करें यह उपाय
हमारे जीवन में बीमारियों का आना-जाना लगा रहता है। कुछ बीमारियां थोड़े समय में ठीक हो जाती हैं वहीं कुछ लंबे समय तक परेशान करती हैं। क्षय रोग यानी टीबी भी लंबे समय तक रहने वाली बीमारी है। वर्तमान में इस रोग का पूर्णत: सफल उपचार संभव है। लेकिन साथ-साथ ही यदि नीचे लिखा उपाय भी किया जाए तो यह रोग और भी शीघ्र ठीक हो जाता है। यह उपाय इस प्रकार है-
उपाय
श्रावण मास में प्रत्येक दिन शिवलिंग को मधु (शहद) अर्पण करने से टी बी रोग का नाश होता है। सबसे पहले शिवलिंग को बिल्व पत्र व धतूरा अर्पण करें इसके बाद शिवलिंग को जल से स्नान कराएं व दाएं हाथ में शहद लेकर शिवलिंग पर चढाएं एवं बाएं हाथ से मालिश करें फिर पुन: शिवलिंग को शुद्ध जल से स्नान कराएं व भगवान शिव से रोग मुक्ति के लिए प्रार्थना करें। इस तरह क्षय रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
इस टोटके को करने से होगा धन लाभ
जीवन में कई तरह की मुश्किलें आती हैं। व्यक्ति हर तरह की मुसीबतों से जुझता हुआ आगे बढ़ता जाता है लेकिन धन का अभाव एक ऐसी समस्या है जिससे जुझते हुए जीवन बिताना सबसे मुश्किल काम है। धन की कमी से उबरने और अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए सावन में शिव की आराधना से सरल कोई और उपाय नहीं है। धन से जुड़ी समस्या से निजात पाने के लिए सावन मास के किसी शुक्रवार को यह साधारण टोटका करें-
टोटका
श्रावण मास के किसी शुक्रवार को यथाशक्ति (जितना संभव हो) चावल भगवान शिव मंदिर ले जाएं। अब अपने दोनों हाथों में जितने चावल आ जाएं उतने शिवजी को अर्पण कर दें और भगवान शिव से धन प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। जितने अक्षत के दानें शिवजी को अर्पण किए जाते हैं, उसका उतने ही हजार गुना फल मिलता है। अब बचा हुआ चावल गरीबों में बांट दें। यह धन प्राप्ति का अचूक उपाय है
3 काम आज से ही शुरु कर दें...किस्मत कल से ही बदलती दिखेगी!
किश्मत, भाग्य, तकदीर, लक, प्रारब्ध, कर्मफल, योग, नियति...ये कुछ ऐसे बहुप्रचलित शब्द हैं जिनसे सभी परिचित हैं। कोई कितना भी मेहनती और सफल क्यों न हो जिंदगी में कभी न कभी ऐसे हालात अवश्य बन जाते हैं जब व्यक्ति को भाग्य और योग-संयोग की बातें सोचने और मानने पर मजबूर होना ही पड़ता है।
कहते हैं कि वैसे तो कर्मों के फल को कोई नहीं रोक सकता, वह हर हाल में भोगना ही पड़ता है। लेकिन हमेशा से ही कुछ बातें या कहें कि शक्तियां ऐसी अवश्य ही रही हैं जिनके बल पर अनहोनी या असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। ऐसा ही संयोग दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलने के विषय में होता है। आइये जाने उन अकाट्य और अजैय शाक्तियों को जो बुरी से बुरी किश्मत को भी सौभाग्य में बदलने की क्षमता रखती हैं....
1. बह्मुहूर्त में जागरण:
अभी तक आपका जो भी रुटीन रहा हो लेकिन कल से ही आप सूर्योदय से पहले हर हाल में बिस्तर छोड़ कर उठ जाएं। नित्य कर्मों से निपट कर साफ और सफेद रंग के वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा की और मुंह करके बैठें और 15 से 20 मिनिट तक सुख-समृद्धि और प्रशन्नता का ध्यान करें।
2. कुंडलिनी शक्ति:
योग-अध्यात्म में कुंडलिनी शक्ति को हमारे शरीर में मेरूदंड में स्थित बताया जाता है। मेरुदंड के अंतर्गत ही ऐसे गुप्त शक्ति केन्द्र होते हैं जिन्हें जगाकर साधक का सारा दुर्भाग्य मिटाया जा सकता है।
एकाएक कुंडलिनी का जागरण कर पाना किसी के लिये भी संभव नहीं होता है, इसीलिये व्यक्ति को कल से इस बात की शुरुआत अवश्य कर देना चाहिये कि वह जब भी जंहा भी बैठे अपनी रीढ़ को यानी मेरुदंड को हर हाल में सीधा रखे। कमर झुकाकर बैठने से कुंडलिनी शक्ति कुंद होने लगती है, जिससे इंसान दुर्भाग्य से जल्दी प्रभावित हो जता है।
3. 324 बार गायत्री मंत्र का जप:
गायत्री मंत्र की शक्तियों से आज सारी दुनिया और विज्ञान जगज भी परिचित है। आध्यात्मिक शास्त्रों की यह निश्चित मान्यता है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन सूर्योदय के समय निश्चित समय, निश्वित स्थान पर विशुद्ध आसन पर बैठकर 3-माला गायत्री का जब करता है उसके सारे बुरे प्रारब्ध कर्मफलों का नाश हाने लगता है। तथा पहले दिन से दुर्भाग्य सौभाग्य में परिवर्तित होने लगता है।
जेब में रखें पीली कौड़ी, जेब पैसों से रहेगी हमेशा गर्म
आज सभी चाहते हैं उनकी जेब हमेशा ही पैसों से भरी रहे और धन से जुड़ी समस्याएं उनसे दूर रहे। पैसा कमाने के लिए सभी अपने-अपने स्तर में खूब मेहनत करते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं उन्हें ज्यादा धन प्राप्त हो पाता है। ज्योतिष के अनुसार कुछ विशेष योग होते हैं जिनसे व्यक्ति को जीवन में कभी पैसों की कमी नहीं रहती।
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई ग्रह अशुभ प्रभाव देने वाला है तो उसकी आय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कुंडली में अशुभ ग्रह को ठीक करने के लिए सही उपचार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त धन की देवी महालक्ष्मी की आराधना भी श्रेष्ठ फल प्रदान करती है। महालक्ष्मी की कृपा के बाद भक्त को कभी भी पैसों की कमी नहीं रहती है।
नियमित रूप से देवी लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। इसके साथ ही एक अन्य उपाय अपनाएं। जिससे निश्चित ही कुछ दिनों में पैसों से जुड़ी समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।
किसी भी शुभ मुहूर्त में बाजार से दो पीली कौड़ी लेकर आएं। यह किसी भी पूजन सामग्री की दुकान पर आसानी से मिल जाती है। घर आकर किसी विशेष दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य कर्म आदि करने के बाद महालक्ष्मी के पूजन की तैयारी करें। पूजन में देवी लक्ष्मी का चित्र या मूर्ति रखें। मूर्ति के साथ ही दोनों पीली कौडिय़ों को रखें। अब विधि-विधान से देवी लक्ष्मी की पूजा करें। पूजन के बाद दोनों पीली कौडिय़ों को अलग-अलग लाल कपड़े में बांधे। अब एक कौड़ी घर में वहां रखें जहां पैसा रखते हैं। दूसरी कौड़ी अपने साथ अपनी जेब में हमेशा रखें। ध्यान रहे कौड़ी साथ रखने के बाद अधार्मिक कार्यों से खुद को बचाकर रखें। अन्यथा यह उपाय निष्फल हो जाएगा।
मनचाहे स्थान पर तबादला करवाना है तो यह करें
नौकरी के लिए कई बार इंसान को अपना घर-परिवार सब छोडऩा पड़ता है। ऐसे में वह अपने कार्य के प्रति पूरी ईमानदारी नहीं बरत पाता। उसका मन अपने घर पर ही लगा रहता है। उसे लगता है कि काश मेरा तबादला वहां हो जाएं जहां मैं चाहता हूं। अगर आपके साथ भी यही समस्या है तो नीचे लिखे उपाय से आपकी इस समस्या का समाधान हो सकता है।
उपाय
शुक्रवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में चंद्रमा दिखाई देने पर सफेद बर्फी या थोड़ा सा दही अपने ऊपर सात बार उतारें और अपने मन में श्रद्धा व विश्वास के साथ चंद्रदेव से प्रार्थना करें- हे चंद्रदेव। मेरा तबादला अमुक(स्थान का नाम बोलें) स्थान पर करवाने की कृपा करें। सात बार यह क्रिया करते हुए मंत्र पढ़कर बर्फी या दही को सूर्योदय से पहले किसी चौराहे पर जाकर रख आएं। जिस दिशा में चंद्रमा आसमान में हो अपना मुख उस ओर रखना चाहिए तथा यह क्रिया छत पर बाहर खुले में करें लेकिन कोई देख न पाएं। अपना कार्य पूर्ण होने पर चंद्रमा को अध्र्य दें, पूजा करें व सफेद बर्फी या खीर को भोग लगाएं।
पति का गुस्सा दूर करें इस उपाय से
पति-पत्नी में विवाद आम बात है क्योंकि जहां प्यार होता है तकरार भी वहीं होती है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है पति बिना किसी बात के ही अपनी पत्नी पर गुस्सा करने लगते हैं और धीरे-धीरे यह उनका आदत बन जाती है। अगर आपके साथ भी यही समस्या है तो नीचे लिखा उपाय करें।
उपाय
जिस स्त्री का पति हर समय बिना बात के ही गुस्सा करता रहता है तो वह स्त्री शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार, सोमवार, गुरुवार या शुक्रवार को एक नए सफेद कपड़े में एक डली गुड़, चांदी एवं तांबे के दो सिक्के, एक मुट्ठी नमक व गेहूं को बांधकर अपने शयनकक्ष में कहीं ऐसी जगह छिपा कर रख दें। इसके प्रभाव से पति का गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगेगा।
एक उपाय- खाली नहीं रहेगा पर्स, घर में आएगा पैसा
जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं के साधनों में वृद्धि हो रही है वैसे-वैसे ही अधिकांश परिवारों में आर्थिक परेशानियां बढ़ रही है। कुछ घरों में काफी अधिक फिजूल खर्च होता है या परिवार में कोई न कोई हमेशा बीमार रहता है, इसी प्रकार के खर्चों के चलते घर में पैसों की तंगी आ जाती है।
ज्योतिष के अनुसार अलग-अलग ग्रह अलग-अलग खर्चों के से संबंधित हैं। यदि कोई ग्रह अशुभ स्थिति में है तो उसकी वजह से कई परेशानियां हो सकती हैं।
कुंडली के ग्रह दोषों को दूर करने के लिए ज्योतिष में अलग-अलग ग्रहों के लिए अलग-अलग उपाय बताए गए हैं। इसके अलावा सभी प्रकार के ग्रह दोषों को दूर करने के लिए हनुमानजी की पूजा सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हनुमान को प्रसन्न करने के लिए मंगलवार और शनिवार श्रेष्ठ दिन माने गए हैं।
घर के फिजूल खर्च को रोकने और आय बढ़ाने के लिए प्रति मंगलवार या शनिवार को किसी भी हनुमान मंदिर में बजरंग बली की प्रतिमा का पूरा श्रंगार करवाएं। ऐसा हर सप्ताह करें। इसके साथ जरूरतमंद और गरीबों को यशाशक्ति खाना खिलाएं और दान दें।
इस प्रकार करने से आपके घर के फिजूल खर्चों में कमी आएगी और सभी सदस्यों की आय में बढ़ोतरी होगी। ध्यान रहे कभी भी कोई अधार्मिक कर्म नहीं करें। अन्यथा भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होती है।
Tuesday, August 2, 2011
इस टोटके से आप भी पा सकते हैं नौकरी
आज के समय अगर कोई सबसे बड़ी समस्या है तो वह है बेरोजगारी की। सिफारिश के अभाव में पढ़े-लिखे लोगों को भी नौकरी मिलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में सबसे ज्यादा फर्क मध्यमवर्गीय लोगों पर पड़ता है। यदि आप चाहते हैं कि आपके पास भी एक नौकरी हो तो नीचे लिखा उपाय करें-
शुक्ल पक्ष के किसी शुक्रवार या पुष्य नक्षत्र के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर पूर्व दिशा में मुंह हो, इस प्रकार बैठ जाएं। अपने सामने बाजोट(बैठने का पटिया) पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर चावल की ढेरी बनाएं। अब इसके ऊपर तीन लघु नारियल स्थापित करें तथा घी का दीपक जला लें। इसके बाद मूंगे की माला से इस मंत्र का जप करें-
मंत्र
ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं यक्षिणी प्रियन्तान् मम्।।
इस मंत्र की कम से कम 11 माला जप करें। पूजन के बाद नारियल सहित लाल वस्त्र की पोटली बनाकर तालाब या नदी में विसर्जन कर दें व मूंगे की माला स्वयं पहन लें। भगवान से प्रार्थना करें कि शीघ्र ही आपको मनचाही नौकरी मिल जाए। इस प्रयोग का असर आपको जल्दी ही नजर आने लगेगा।
अगर करें ऐसा..फिजूल खर्च होगा कम, घर में आएगी बरकत
जैसे-जैसे सुख-सुविधाओं के साधनों में वृद्धि हो रही है वैसे-वैसे ही अधिकांश परिवारों में आर्थिक परेशानियां बढ़ रही है। कुछ घरों में काफी अधिक फिजूल खर्च होता है या परिवार में कोई न कोई हमेशा बीमार रहता है, इसी प्रकार के खर्चों के चलते घर में पैसों की तंगी आ जाती है।
ज्योतिष के अनुसार अलग-अलग ग्रह अलग-अलग खर्चों के से संबंधित हैं। यदि कोई ग्रह अशुभ स्थिति में है तो उसकी वजह से कई परेशानियां हो सकती हैं।
कुंडली के ग्रह दोषों को दूर करने के लिए ज्योतिष में अलग-अलग ग्रहों के लिए अलग-अलग उपाय बताए गए हैं। इसके अलावा सभी प्रकार के ग्रह दोषों को दूर करने के लिए हनुमानजी की पूजा सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हनुमान को प्रसन्न करने के लिए मंगलवार और शनिवार श्रेष्ठ दिन माने गए हैं।
घर के फिजूल खर्च को रोकने और आय बढ़ाने के लिए प्रति मंगलवार या शनिवार को किसी भी हनुमान मंदिर में बजरंग बली की प्रतिमा का पूरा श्रंगार करवाएं। ऐसा हर सप्ताह करें। इसके साथ जरूरतमंद और गरीबों को यशाशक्ति खाना खिलाएं और दान दें।
इस प्रकार करने से आपके घर के फिजूल खर्चों में कमी आएगी और सभी सदस्यों की आय में बढ़ोतरी होगी। ध्यान रहे कभी भी कोई अधार्मिक कर्म नहीं करें। अन्यथा भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होती है।
पलंग के नीचे यह सामान रखने से बचें कुंवारे लड़के-लड़कियां
सामान्यत: घरों में पलंग के नीचे कुछ न कुछ सामान अवश्य ही रखा जाता है। पलंग या बेड का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण होता है। 24 घंटे में से कम से कम 6-8 घंटे हम सोते हैं। इस बात से स्पष्ट है कि अच्छी नींद के लिए अच्छा बेड होना बहुत जरूरी है।
वास्तु शास्त्र के अनुसार यदि बेड भी अच्छा हो लेकिन फिर भी उस पर सोने वाले लड़के या लड़की की शादी नहीं हो रही है या अन्य कोई परेशानियां चल रही है तो निश्चित ही उन युवाओं के पलंग के नीचे वास्तुदोष उत्पन्न करने वाली वस्तुएं रखी हुई हो सकती हैं। वास्तुदोष उत्पन्न करने वाली वस्तुओं में लोहे का सामान, पुराना कबाड़ा आदि शामिल है।
विवाह योग्य लड़के और लड़किया जिस पलंग पर सोते हों उसके नीचे लोहे की वस्तुएं या व्यर्थ का सामान नहीं रखना चाहिए। इनसे वास्तुदोष उत्पन्न होता है।
वास्तु शास्त्र सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा के सिद्धांत पर कार्य करता है। अत: ऐसी वस्तुओं से नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है जिससे युवाओं के विचारों में भी नकारात्मकता पैदा होती है। उनका मन व्यर्थ की बातों में भटकने लगता है और उन्हें मानसिक शांति नहीं मिल पाती। इसी वजह से पलंग के नीचे एकदम साफ रखना चाहिए। वहां कोई भी सामान रखने से बचें।
4 को नागपंचमी, इन उपायों से दूर होगा कालसर्प दोष
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष होता है वह जीवनभर कई परेशानियों का सामना करता है। वह कई बार इतना तनाव महसूस करता है कि उसे उसका भविष्य अंधकारमय लगने लगता है। नागपंचमी(इस बार 4 अगस्त, गुरुवार) के दिन यदि कुछ साधारण उपाय किए जाएं तो इस दोष का शांति की जा सकती है।
उपाय
- चांदी के सर्प की पूजा करें और सफेद पुष्प के साथ इसे बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें।
- शिव उपासना लघु रुद्र का पाठ कराएं।
- सफेद फूल व बताशे बहते हुए जल में प्रवाहित करें और कालसर्प दोष की शांति के लिए प्रार्थना करें।
- शिवलिंग पर तांबे का नाग ब्रह्ममुहूर्त में चढ़ाएं। चांदी का नाग-नागिन का जोड़ा नदी में बहाएं।
- इस दिन दान-पुण्य कर करें और सफेद मिठाई का दान करें।
- नवनाग स्तोत्र का पाठ करें।
- राहु व केतु की उपासना करें।
- पीपल के वृक्ष की पूजा करें तथा शाम के समय पीपल के नीचे दीपक जलाएं।
कौन सा रुद्राक्ष किस मंत्र के साथ धारण करें?
रुद्राक्ष के चौदह प्रकार हैं। शास्त्रों में लिखा है कि रुद्राक्ष धारण करने वाले पुरुष को देखकर सभी बुरी आत्माएं भाग जाती हैं तथा शिव, पार्वती, विष्णु, गणेश, सूर्य, दुर्गा आदि सभी देवता प्रसन्न होते हैं। शास्त्रों में वर्णित चौदह ही प्रकार के रुद्राक्ष अलग-अलग फल देने वाले हैं। शिवमहापुराण की विद्येश्वरसंहिता संहिता में रुद्राक्ष धारण करने के मंत्रों का उल्लेख है जो इस प्रकार है-
प्रकार मंत्र
एकमुखी ऊँ ह्रीं नम:।
दो मुखी ऊँ नम:।
तीन मुखी ऊँ क्लीं नम:।
चार मुखी ऊँ ह्रीं नम:।
पंच मुखी ऊँ ह्रीं नम:।
छ: मुखी ऊँ ह्रीं हुं नम:।
सात मुखी ऊँ हुं नम:।
आठ मुखी ऊँ हुं नम:।
नौ मुखी ऊँ ह्रीं हुं नम:।
दस मुखी ऊँ ह्रीं नम:।
ग्यारह मुखी ऊँ ह्रीं हुं नम:।
बारह मुखी ऊं क्रौं क्षौं रौं नम:।
तेरह मुखी ऊँ ह्रीं नम:।
चौदह मुखी ऊँ नम:।
नागपंचमी: कालसर्प दोष के प्रकार व उनका निदान
कालसर्प दोष का नाम सुनते ही लोगों के मन में भय उत्पन्न हो जाता है क्योंकि जिन लोगों की कुंडली में यह दोष होता है उन्हें अपने जीवन में अनेक कठिनाइनों का सामना करना पड़ता है। विद्वानों के अनुसार कालसर्प दोष मुख्य रूप से 12 प्रकार का होता है, इसका निर्धारण जन्म कुंडली देखकर ही किया जा सकता है। प्रत्येक कालसर्प दोष के निवारण के लिए अलग-अलग उपाय हैं। नीचे प्रथम 6 कालसर्प दोष निवारण के उपाय बताए गए हैं। यह उपाय नागपंचमी(4 अगस्त, गुरुवार) के दिन करने से श्रेष्ठ लाभ मिलता है।
उपाय
- अनन्त कालसर्प दोष होने पर नागपंचमी के दिन एकमुखी, आठमुखी या नौमुखी रुद्राक्ष धारण करें।
- यदि स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है तो नागपंचमी के दिन रांगे से बना सिक्का पानी में प्रवाहित करें।
- कुलिक नामक कालसर्प दोष होने पर नागपंचमी के दिन दो रंग वाला कंबल अथवा गर्म वस्त्र दान करें।
- चांदी की ठोस गोली बनवाकर उसकी पूजा करें और उसे अपने पास रखें।
- वासुकि कालसर्प दोष होने पर नागपंचमी से पूर्व रात्रि को सोते समय सिरहाने पर थोड़ा बाजरा रखें और सुबह उठकर उसे पक्षियों को खिला दें।
- नागपंचमी के दिन लाल धागे में तीन, आठ या नौमुखी रुद्राक्ष धारण करें।
- शंखपाल कालसर्प दोष के निवारण के लिए नागपंचमी के दिन 400 ग्राम साबूत बादाम बहते पानी में प्रवाहित करें।
- शिवलिंग का दूध से अभिषेक करें।
- पद्म कालसर्प दोष होने पर नागपंचमी से प्रारंभ करते हुए 40 दिनों तक रोज सरस्वती चालीसा का पाठ करें।
- इस दिन जरुरतमंदों को पीले वस्त्र का दान करें और तुलसी का पौधा लगाएं।
- महापद्म कालसर्प दोष के निदान के लिए नागपंचमी के दिन हनुमान मंदिर में जाकर सुंदरकांड का पाठ करें।
- नागपंचमी के दिन यथाशक्ति को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा दें।
नागपंचमी पर करें यह टोटका, मिलेगी कालसर्प दोष से मुक्ति
कालसर्प दोष जब किसी की कुंडली में होता है तो उसे सफलता मिलने में काफी समय लगता है और उसे जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखने पड़ते हैं। यदि आप भी कालसर्प दोष से पीडि़त हैं तो नीचे लिखे एक छोटे से टोटके से इस दोष के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है-
टोटका
नागपंचमी के दिन शाम के समय 1 किलो कच्चे कोयले व 3 नारियल ले जाकर बहते पानी में डालें। सबसे पहले एक-एक नारियल डालें फिर एक साथ सभी कोयले डाल दें। उसके बाद अपने घर आ जाएं। घर आने के बाद 1 माला महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। ध्यान रहे यह टोटका अनटोका करें और लगातार करें।
इस टोटके से कालसर्प दोष का प्रभाव कम हो जाएगा और आपको जीवन में सफलता मिलने लगेगी।
कुछ उपाय
छोटे-छोटे उपाय हर घर में लोग जानते हैं, पर उनकी विधिवत्
जानकारी के अभाव में वे उनके लाभ से वंचित रह जाते हैं। इस लोकप्रिय
स्तंभ में उपयोगी टोटकों की विधिवत् जानकारी दी जा रही है...
परीक्षा में सफलता हेतु : परीक्षा में सफलता हेतु गणेश रुद्राक्ष धारण करें। बुधवार को गणेश जी के मंदिर में जाकर दर्शन करें और मूंग के लड्डुओं का भोग लगाकर सफलता की प्रार्थना करें।
पदोन्नति हेतु : शुक्ल पक्ष के सोमवार को सिद्ध योग में तीन गोमती चक्र चांदी के तार में एक साथ बांधें और उन्हें हर समय अपने साथ रखें, पदोन्नति के साथ-साथ व्यवसाय में भी लाभ होगा।
मुकदमे में विजय हेतु : पांच गोमती चक्र जेब में रखकर कोर्ट में जाया करें, मुकदमे में निर्णय आपके पक्ष में होगा।
पढ़ाई में एकाग्रता हेतु : शुक्ल पक्ष के पहले रविवार को इमली के २२ पत्ते ले आएं और उनमें से ११ पत्ते सूर्य देव को ¬ सूर्याय नमः कहते हुए अर्पित करें। शेष ११ पत्तों को अपनी किताबों में रख लें, पढ़ाई में रुचि बढ़ेगी।
कार्य में सफलता के लिए : अमावस्या के दिन पीले कपड़े का त्रिकोना झंडा बना कर विष्णु भगवान के मंदिर के ऊपर लगवा दें, कार्य सिद्ध होगा।
व्यवसाय बाधा से मुक्ति हेतु : यदि कारोबार में हानि हो रही हो अथवा ग्राहकों का आना कम हो गया हो, तो समझें कि किसी ने आपके कारोबार को बांध दिया है। इस बाधा से मुक्ति के लिए दुकान या कारखाने के पूजन स्थल में शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को अमृत सिद्ध या सिद्ध योग में श्री धनदा यंत्र स्थापित करें। फिर नियमित रूप से केवल धूप देकर उनके दर्शन करें, कारोबार में लाभ होने लगेगा।
गृह कलह से मुक्ति हेतु : परिवार में पैसे की वजह से कलह रहता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख में पांच कौड़ियां रखकर उसे चावल से भरी चांदी की कटोरी पर घर में स्थापित करें। यह प्रयोग शुक्ल पक्ष के प्रथम शुक्रवार को या दीपावली के अवसर पर करें, लाभ अवश्य होगा। क्रोध पर नियंत्रण हेतु : यदि घर के किसी व्यक्ति को बात-बात पर गुस्सा आता हो, तो दक्षिणावर्ती शंख को साफ कर उसमें जल भरकर उसे पिला दें।
मकान खाली कराने हेतु : शनिवार की शाम को भोजपत्र पर लाल चंदन से किरायेदार का नाम लिखकर शहद में डुबो दें। संभव हो, तो यह क्रिया शनिश्चरी अमावस्या को करें। कुछ ही दिनों में किरायेदार घर खाली कर देगा। ध्यान रहे, यह क्रिया करते समय कोई टोके नहीं।
बिक्री बढ़ाने हेतु : ग्यारह गोमती चक्र और तीन लघु नारियलों की यथाविधि पूजा कर उन्हें पीले वस्त्र में बांधकर बुधवार या शुक्रवार को अपने दरवाजे पर लटकाएं तथा हर पूर्णिमा को धूप दीप जलाएं। यह क्रिया निष्ठापूर्वक नियमित रूप से करें, ग्राहकों की संख्या में वृद्धि होगी और बिक्री बढ़ेगी
संतान प्राप्ति के लिए
• चार वीरवार को 900 ग्राम जौं चलते जल में बहाए |
• वीरवार का व्रत भी रखना शुभ होगा |
• राधा कृष्णजी के मंदिर में शुक्ल पक्ष के वीरवार या जन्माष्टमी को चान्दी की बांसुरी चढाये |
• लाल या भूरी गायें को आट्टे का पेढा व पानी दे |
उपाय मन से करने से मनोकामना पूरण होगी |
बच्चों को वश में करने का अनुभूत मन्त्र प्रयोग
आजकल बच्चे नशे या कुकर्मों में लिप्त होकर अपना भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। काम नहीं करते हैं और यूं ही समय बर्बाद करते हैं। कहना भी नहीं मानते हैं। अपने माता-पिता की चिन्ता का कारण बने हुए हैं।
दीपावली, ग्रहण या किसी शुभ मुहूर्त्त में इस मन्त्र को सिद्ध कर लें। अमुक के स्थान पर जिस बच्चे को वश में करना है या कन्ट्रोल में लाना है उसका नाम लें।
मन्त्र की दस माला करने के बाद लौंग, इलायची या मिसरी को 21 बार मन्त्र पढ़कर अभिमन्त्रित कर लें। बाद मे जिसका नाम लें उसे चाय में या प्रसाद में देकर खिला दें। वह बच्चा वश में हो जाएगा और आज्ञा मानेगा। यह प्रयोग पहली बार में सफल न हो तो पुनः करें। मन्त्र इस प्रकार है-
ऊं क्लीम् क्लीम् अमुकं मम वश्यं कुरु कुरु स्वाहा।
बुधवार को बोलें गणेश की 12 नाम मंत्र स्तुति..हर कदम पर मिलेगी कामयाबी
धर्मग्रंथ भगवान गणेश के संकटनाशक, विघ्रहर्ता स्वरुप, शक्तियों और गुणों की महिमा का गान करते हैं। दरअसल, श्री गणेश की उपासना से मिलने वाले फल जीवन में उन बातों का महत्व और उपयोगिता को समझने और अपनाने पर जोर देते हैं, जिनमें बुद्धि, कर्म, ज्ञान और पुरुषार्थ प्रमुख हैं।
ये सभी जीवन में हर संकट दूर कर पग-पग पर सफलता झोली में डाल देते हैं। अगर आप भी ऐसे ही सफल जीवन की कामना करते हैं तो सावन माह, बुधवार और विनायक चतुर्थी के शुभ योग में यहां बताई जा रही भगवान गणेश की प्रसिद्ध मंत्र स्तुति का पाठ नीचे बताई आसान विधि से कर मनोरथ सिद्ध करें -
- स्नान के बाद देवालय में भगवान गणेश का ध्यान कर श्री गणेश मूर्ति या तस्वीर पर सिंदूर, चंदन, अक्षत, फूल और 21 दूर्वा दल के साथ मोदक, मिठाई या किसी फल का भोग लगाएं। दूर्वा चढ़ाते वक्त नीचे लिखा मंत्र बोलें -
दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्।
आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक।।
इसके बाद नीचे लिखा 12 नाम मंत्रों के स्मरण का श्रीसंकष्टनाशनगणेशस्तोत्रम बोलें व श्री गणेश आरती कर प्रसाद ग्रहण करें -
प्रणम्यं शिरसा देव गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेनित्यमायुष्कामार्थसिद्धये।1।
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णं पिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।2।
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ।3।
नवमं भलाचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्।4।
द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर:।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं परम्।5।
विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ।6।
जपेद् गणपतिस्तोत्रं षडभिर्मासै: फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ।7।
अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा य: समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत् सर्वा गणेशस्य प्रसादत:।8।
अगर सात दिनों में चाहिए कालसर्प और पितृ दोष से मुक्ति तो...
अगर आपकी कुंडली में पितृ दोष और कालसर्प जैसे बड़े दोष है तो आप सावन महीने में कुछ अचूक उपाय करें। श्रावण माह में सात दिनों तक कुछ अचूक उपाय करें तो आपको कुंडली के इन बड़े दोषों से होने वाले नुकसान से जल्दी ही छुटकारा मिल जाएगा। सावन को पवित्र और शिव का महीना माना गया है। इस महीने में होने वाली शिव पूजा और उपायों से कई तरह के दोष और बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है।
- प्रतिदिन इक्कीस माला ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करें।
- रोज भगवान शिव का जलाभिषेक करें।
- कालसर्पदोष निवारक यंत्र घर में स्थापित करें और सरसों के तेल का दीपक लगा कर नियमित पूजन करें।
- नाग के जोड़े चांदी के बनवाकर उन्हें तांबे के लौटे में रख बहते पानी में एक बार प्रवाहित कर दें।
- प्रतिदिन स्नान कर के नवनागस्तोत्र का पाठ करें।
- पितृ देवता को धूप दें।
- गरीब ब्राह्मण को चावल का दान दें।
- 10 वर्ष से कम उम्र की कन्याओं को सफेद मिठाई खिलाएं।
- रोज सुबह कच्चे दूध से शिवलिंग का अभिषेक करें।
नागपंचमी: इन मंत्रों से दूर होता है सांपों का डर
सांप का नाम सुनते ही हर किसी को भय का अनुभव होने लगता है। देखने में आता है कि कई लोग अज्ञात रूप से सर्प भय से ग्रसित रहते हैं। ऐसा पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण हो सकता है या फिर कालसर्प दोष के कारण भी यह संभव है। जिन लोगों को कालसर्प दोष होता है उन्हें सपनें में भी सांप दिखाई देते हैं। यदि आप भी ऐसी ही किसी परेशानी से ग्रसित हैं तो इसका उपाय महाभारत के आदि पर्व में मंत्रों के माध्यम से बताया गया है। इन मंत्रों का जप विधि-विधान से किया जाए तो सभी प्रकार के सर्प भय से मुक्ति मिल जाती है। यदि इन मंत्रों का जप नागपंचमी(इस बार 4 अगस्त, गुरुवार) के दिन किया जाए तो और भी बेहतर फल प्राप्त होता है।
मंत्र
यो जरत्कारुणा जातो जरत्कारौ महायशा:।
आस्तीक: सर्पसत्रे व: पन्नगान् योभ्यरक्षत।
तं स्मरन्तं महाभागा न मां हिंसितुमर्हथ।।
महाभारत, आदि पर्व (58/24)
सर्पापसर्प भद्रं त गच्छ सर्प महाविष।
जनमेजयस्य यज्ञान्ते आस्तीकवचं स्मर।।
(58/25)
आस्तीकस्य वच: श्रुत्वा य: सर्पो न निवर्तते।
शतधा भिद्यते मूध्नि शिंशवृक्षफलं यथा।।
(58/26)
नागपंचमी 4 को, कालसर्प दोष दूर करें इन उपायों से
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस व्यक्ति की कुंडली में कालसर्प दोष होता है वह जीवनभर कई परेशानियों का सामना करता है। वह कई बार इतना तनाव महसूस करता है कि उसे उसका भविष्य अंधकारमय लगने लगता है। नागपंचमी(इस बार 4 अगस्त, गुरुवार) के दिन यदि कुछ साधारण उपाय किए जाएं तो इस दोष का शांति की जा सकती है।
उपाय
- चांदी के सर्प की पूजा करें और सफेद पुष्प के साथ इसे बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें।
- शिव उपासना लघु रुद्र का पाठ कराएं।
- सफेद फूल व बताशे बहते हुए जल में प्रवाहित करें और कालसर्प दोष की शांति के लिए प्रार्थना करें।
- शिवलिंग पर तांबे का नाग ब्रह्ममुहूर्त में चढ़ाएं। चांदी का नाग-नागिन का जोड़ा नदी में बहाएं।
- इस दिन दान-पुण्य कर करें और सफेद मिठाई का दान करें।
- नवनाग स्तोत्र का पाठ करें।
- राहु व केतु की उपासना करें।
- पीपल के वृक्ष की पूजा करें तथा शाम के समय पीपल के नीचे दीपक जलाएं।
किसी सुहागन महिला या लड़की को खाना खिलाएंगे तो घर में...
आज अधिकांश घरों में पति-पत्नी के बीच लड़ाई झगड़े आम बात हो गई है। रोज छोटी-छोटी बातों पर घर में तू-तू, मैं-मैं होती हैं। ऐसे में पति और पत्नी दोनों को ही मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। जिससे पारिवारिक स्थिति के साथ घर की आर्थिक स्थिति पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे बचने के लिए दोनों को ही एक-दूसरे को समझने के प्रयास करने होंगे। ज्योतिष के अनुसार इन प्रयासों के साथ कुछ अन्य ज्योतिषीय उपाय भी करने चाहिए।
विवाह और वैवाहिक जीवन में सुख-दुख को सबसे अधिक गुरु ग्रह प्रभावित करता है। यदि पति या पत्नी दोनों में से किसी एक का भी गुरु अशुभ या बुरे स्थिति में हो तो उनका वैवाहिक जीवन तनाव से भरा रहता है। गुरु की स्थिति को सुधारने के लिए एक सटीक उपाय बताया गया है। प्रति गुरुवार यह उपाय अपनाएं। गुरुवार के दिन किसी गरीब को गेंहू एवं चने की दाल दान करने से या किसी सुहागन स्त्री को भोजन कराने अथवा किसी कन्या को खाना खिलाने से पति-पत्नि के मध्य होने वाला विवाद समाप्त हो जाता है। यह भी नहीं कर पाएं तो शिवलिंग पर चने की दाल अर्पण करने से भी लाभ होता है। इन उपायों को अपनाने से निश्चित ही पति-पत्नी के बीच प्यार बढ़ेगा और आपसी झगड़ों से छुटकारा मिलेगा।
मंगलवार और शनिवार को हनुमानजी को ऐसे पूजें, हो जाओगे मालामाल
आज के समय में हनुमानजी की भक्ति सबसे जल्दी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली गई है। हनुमानजी को माता सीता ने अमरता का वरदान दिया है। श्रीराम के अनन्य सेवक बजरंग बली अपने भक्तों को सभी सुख प्रदान करते हैं। वे बल, बुद्धि और विद्या के दाता माने गए हैं। बल, बुद्धि और विद्या के बल पर ही कोई भी इंसान धन-दौलत प्राप्त कर सकता है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में धन से जुड़ी समस्याएं चल रही हैं तो उसे हनुमानजी को पूजने से जल्द ही शुभ फल प्राप्त होते हैं।
हर मंगलवार और शनिवार को किसी भी हनुमान मंदिर में 11 काले उड़द के दाने, सिंदूर, चमेली का तेल, फूल, प्रसाद अर्पित करें। साथ ही सुंदरकांड का पाठ करें या समय अभाव हो तो हनुमान चालिसा का पाठ करें। मंगलवार को शनिवार को हनुमानजी का विधिवत पूजन करने से सभी प्रकार के कष्ट और क्लेश नष्ट हो जाते हैं। इसके साथ ही कुंडली में शनि के अशुभ प्रभाव भी दूर हो जाते हैं। इस उपाय को अपनाने से कुछ ही दिनों में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने लगेंगे। ध्यान रखें पवित्रता का पूरा ध्यान रखें। किसी भी प्रकार के अधार्मिक कर्मों से दूर रहें। किसी भी स्थिति में घर के बड़े-बुजूर्गों सहित अन्य वृद्धजनों का सम्मान करें, उनका दिल ना दुखाए
totka
Vyapar vridhi ke liye saral totka
Shanivar ke din ek peepal ka patta tod le phir usko gangajal se dhokar "gaytri mantra" se 21 baar abhimantrit kar le phir us patte ko apne galley (locker) mein rakh de, aisa har shanivar ko kare niymit roop se kare, vyapar mein bahut labh hoga.
Mahawari ki samasya ke liye
Yadi kisi mahila ko masik dharam (mahavari) mein paresaani anubhav ho rahi ho, tab ek mitti ki choti handiya mein gangajal bhar le usme thodi shudh lal roli daal de phir us rogi mahila pr se 21 baar uttarkar bina bole kisi chaurahe pr rakh de. Mahawari ki paresaani door ho jaaygi.
Barkat nahi hone par
Ek handiya mein sawa kilo sabut hari moong, doosari handiya mein sawa kilo namak bharkar dono handiya ko ghar mein kahi rakh de. Aisa budhvar ke din kare. Ghar mein barkat hone lagegi.
Karya mein Safalta ke liye
Agar aapko kisi mahatavpoorna karya ke liye jana ho, to aap ek kagaji neembu le le aur usme charo kono mein sabut long gaad de. Us neembu ko aap apni jeb (pocket) mein rakhkar chale jaay. Us din us karya mein aapko saflata jaroor milegi.
अपने प्यार को पाने का टोटका
अगर आपका जीवनसाथी, प्रेमिका, प्रेमी आप से दूर चला गया हो और वो आपको संपर्क न करे तो आप यह सरल प्रभावकारी टोटका कर सकते है ! आपका बॉस आपसे खुश नहीं रहता या आप की तरफ ध्यान नहीं देता तो भी आप यह कर सकते है !
आप सबसे पहले किसी भी दिन दो सूखे हुए पीपल के पत्ते तोड़ ले, नीचे से न उठाए, कुछ पीले/सूखे से हो, आप जिस से प्यार करते है, या जिस व्यक्ति को प्रभावित करना चाहते हो उस का नाम दोनों पीपल के पत्तो पर लिख दे, एक पत्ते को वही पीपल के पेड़ के पास उल्टा कर के रख दे और उस पर भारी पत्थर रख दे, और दुसरे पत्ते को घर की छत पर उल्टा कर के रख दे और उस पर भी पत्थर रख दे, और प्रतिदिन पीपल के पेड़ में पानी भी चढाये ! कुछ दिन बाद आप को वह व्यक्ति संपर्क करेगा और वो आपकी तरफ आकर्षित होने लगेगा !
आपको जिस भी व्यक्ति को आकर्षित करना है उस के लिए आप ऐसा कर सकते है !
नोट :- भारतवर्ष में टोटको और सात्विक मंत्रो का प्रयोग प्राचीनकाल से चला आ रहा है, व इसमें कोई दो राय नहीं है की इनको करने के पश्चात् व्यक्ति के जीवन में आयी समस्या का निवारण होता है ! यहाँ पर बताये जाने वाले सभी मंतर व टोटके सरल तो है ही व उनको करने पर आपका किसी भी तरह का खर्चा भी नहीं होगा ! आज वशीकरण, शत्रु नाशक व अन्य कार्यो को करने का दावा कर कुछ लोग अपनी दूकान चला रहे है और लोगो की जेब काट रहे है ! आप सभी से अनुरोध है की आप इस तरह के अंधविश्वाश में ना पड़े क्योकि वशीकरण जैसा कुछ नहीं होता है !
ब्लड प्रेशर पर करना है काबू, सावन में जरूर करें यह उपाय
मंत्र
ब्लड प्रेशर एक आम बीमारी है। वर्तमान समय में असंख्य लोग इस बीमारी से पीडि़त है। इस बीमारी के कारण मरीज को अचानक चक्कर आने लगते हैं और हाथ-पैर शिथिल हो जाते हैं। तंत्र शास्त्र के अनुसार ब्लड प्रेशर की बीमारी से निजात पाने के लिए सावन में किया गया यह उपाय चमत्कारिक फल देता है-
उपाय
अपने इष्टदेव के सामने पवित्र होकर तुलसी माला से 108 बार इस मंत्र का जप करें।
ऊँ वग वज्र हस्ताभ्याम नम:
इसके पहले ही एक कटोरी ताजे पानी में पांच पंचमुखी रुद्राक्ष डालकर रखें। जप समाप्त होने के बाद यह पानी पी लें। अब इन रुद्राक्षों को लाल धागे में बीच-बीच में गांठ लगाते हुए माला की तरह पिरोकर भगवान शंकर का ध्यान करते हुए धारण कर लें। यह प्रयोग 21 दिन तक करें। ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहेगा।
मंगल करेंगे शिव पूजा में यह उपाय
भगवान शिव को भूतपति के नाम से भी स्मरण किया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक इस नाम के दो अर्थ हैं - पहला वह भूत-प्रेत के स्वामी हैं और दूसरा पंचभूत या तत्वों यानी जल, आकाश, पृत्वी, अग्रि और वायु के स्वामी, जो जगत की हर रचना का कारण भी माने गए हैं। यह नाम शिव की अनंत और सर्वव्यापी रूप की महिमा बताता है। यही कारण है कि शिव नाम स्मरण के साथ प्राकृतिक सामग्रियों से पूजा और उपासना मंगलकारी मानी गई है।
हिन्दू धर्म में सावन और सोमवार शिव की उपासना का विशेष काल है। शास्त्रों में सावन के तीसरे सोमवार पर शिव पूजा में कुछ विशेष उपाय खुशहाली, सौभाग्य, कार्यसिद्धि और भरपूर धन-धान्य देने वाले माने गए हैं। जानते हैं कल सावन के तीसर सोमवार के लिये शिव पूजा की आसान विधि और उपाय-
- बीते सावन सोमवार की भांति ही शिव की पूजा के पहले स्नान, स्वच्छ वस्त्र पहन पवित्र होकर शिव की पूजा करें। यथासंभव पार्थिव शिवलिंग पूजा करें तो बहुत ही श्रेष्ठ होगी।
- शिव पूजा के दौरान शिव पंचाक्षरी मंत्र या नीचे लिखे मंत्र बोलें -
ऊँ शर्वाय क्षितिमूर्तये नम:।
ऊँ भवाय जलमूर्तये नम:।
ऊँ रुद्राय अग्रिमूर्तये नम:।
ऊँ उग्राय वायुमूर्तये नम:।
ऊँ भीमाय आकाशमूर्तये नम:।
- पाषाण शिवलिंग या पार्थिव शिवलिंग पर गंगाजल की धारा अर्पित कर स्नान कराएं।
- पार्थिव शिवलिंग रचना व पूजा किसी विद्वान ब्राह्मण के मार्गदर्शन में करें तो बेहतर है। यथासंभव पीपल पेड़ के जड़ की मिट्टी या पवित्र स्थान की मिट्टी से पार्थिव लिंग बनाए।
शिव पूजा में विशेष उपाय -
- स्नान के बाद शिव को विशेष रूप से इत्र की धारा चढ़ाएं। यह भौतिक सुखों की कामना पूरी करने वाली मानी गई है।
- चंदन लगाकर गंध, अक्षत, वस्त्र के अलावा खड़े मूंग अर्पित करें, जिससे हर सुख की चाहत पूरी होती है।
- फूल-पत्रों में कमल, शंखपुष्प, बिल्वपत्र या शतपुष्प चढ़ाएं। जिनसे पापनाश व धनलाभ के मनोरथ सिद्ध होते हैं।
- गाय के घी व शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं।
- शिव स्तुति, शिव मंत्र, शिव चालीसा या शिव पुराण का पाठ करें।
- बाद शिव की आरती धूप, दीप व कपूर्र से कर मंगल की कामना स्वयं के साथ घर-परिवार और जगत के लिए करें।
शुक्रवार, 12 अगस्त 2011
भद्रा विष्टी
जब चंन्द्रमा, कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टी करण का योग होता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है। इस समय सभी कार्य शुभ कार्य वर्जित होते है। इसके दोष निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्मग्रंथों में बताया गया है।
मुहूर्त का महत्व क्यों, और कैसे
मुहूर्त का महत्व क्यों, और कैसे कार्य के सुखांत के लिए और मार्ग में आने वाली बाधाओं के परिहार के लिए शुभ मुहूर्त का चयन किया जाता है जिसमें दिन, तिथि, नक्षत्र, करण आदि के शुभाशुभ की जानकारी का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। आइए, जानते हैं मुहूर्त के इन सभी घटक तत्वों की शुभ और अशुभता का स्वरूप क्या है और उससे कार्य को क्या दिशा और दशा प्राप्त होती है। लोक परंपरानुसार किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने के लिये शुभ समय का चयन करना ही मुहूर्त चयन कहलाता है। कार्य की सिद्धि सुनिश्चित करने के लिए शुभ मुहूर्त में अपने कार्य को आरंभ करने का अरमान सभी के दिलों में रहता है। मुहूर्त देखने की प्रथा हजारों वर्षों से चली आ रही है। एक हिंदु सनातन धर्मी ही नहीं अपितु अन्य धर्मों के अनुयायी भी अपनी धार्मिक मान्यताओं के आधार पर कार्यारंभ के पूर्व शुभ समय का विचार करना जरूरी समझते हैं ताकि उनका कार्य बिना किसी विघ्न-बाधा के सफलता के साथ पूर्ण हो जाए। प्रायः ऐसा देखने में आता है कि जब कोई कार्य बिगड़ जाता है, निरर्थक साबित हो जाता है या लाभ के बजाय हानिप्रद सिद्ध होता है तब व्यक्ति सोचने लगता है कि हमने किस मनहूस घड़ी में कार्य शुरू किया था जिसका दुखांत हुआ सुखांत के बदले में। कहने का तात्पर्य यह है कि कार्य-नाश होने के उपरांत ऐसे लोगों को मुहूर्त की महत्ता समझ में आने लगती है और उन्हें शुभ मुहूर्त में कार्यारंभ न करने की गलती का एहसास होने लगता है। ऐसे लोग फिर दोबारा भविष्य में कोई शुभ कार्य करते वक्त शुभ मुहूर्त देखने की चेष्टा अवश्य करने लग जाते हैं। ज्योतिष का मुहूर्त खंड, विभिन्न समयावधि में जातकों के द्वारा आरंभ किये गये कार्यों के शुभाशुभ परिणामों का दिग्दर्शन कराता है। अतः मुहूर्त संबंधी तथ्यों की जानकारी हासिल करने के लिये पंचांग अवलोकन करना अति आवश्यक हो जाता है जिसके आधार पर किस दिन, कौन सी तिथि, नक्षत्र, योग, करणादि कितने बजे से कितने बजे तक हैं, इस बात की जानकारी प्राप्त हो जाती है। इन्हें जान लेने के उपरांत मुहूर्त की गणना की जा सकती है। तिथियां : 1, 6, 11 तिथियों को नंदा कहते हैं। 2, 7, 12 को भद्रा, 3, 8, 13 को जया 4,9, 14 को रिक्ता और 5, 10, 15 को पूर्णा तिथियां कहते हैं। नंदा शुक्रवार को, भद्रा बुधवार को, जया मंगलवार को, रिक्ता शनिवार को शुभ फल तथा विजय दिलाने वाली होती है। इसी तरह पूर्णा तिथियां गुरुवार को पूर्णरूपेण सिद्धिप्रद मानी जाती हैं। करण : तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। करण ग्यारह होते हैं। मुहूर्त की दृष्टि से इन सबका शुभाशुभ फल निम्नानुसार होता है। ''बव'' करण में प्रस्थान करना, ग्राम-नगर आदि में प्रवेश करना शुभ होता है। ''बालव'' करण में विप्र जाति के यज्ञ विवाहादि, चूड़ाकर्म, यज्ञोपवीत जैसे कार्य शुभ होते हैं। शेष तीन वर्णों के लिये यह करण निषिद्ध रहता है। ''तैतिल'' करण में सुंदर आभूषणों का निर्माण एवं राजद्वार संबंधी कार्य शुभ होते हैं। ''कौलव'' करण मित्रता संबंधी कार्यों के लिये प्रसिद्धि एवं सफलता देने वाला होता है। 'गर' करण में गृहारंभ, गृहप्रवेश, वास्तुकर्म, पशुपालन, पशुओं का क्रय-विक्रय शुभ होता है। ''वणिज'' करण व्यवसायियों को व्यापार आरंभ करने के लिये शुभ तथा विक्रेताओं को लाभप्रद होता है। ''विष्टि'' करण को भद्रा कहते हैं। इसमें न तो स्वयं कोई शुभ कार्य करें और और न ही किसी दूसरों से करवायें। विष्टि के लगते ही कार्यारंभ करने से अर्थहानि होती है, विष्टि के आरंभ हो चुकने पर कार्यारंभ किये जाने पर कार्यनाश होता है। विष्टि के मध्यकाल में कार्यारंभ किया जायेगा तो जीवन की हानि होगी यानि यजमान को यमराज का बुलावा आ सकता है। किंतु विष्टि के अंत में जो भी शुभ कार्य आरंभ किया जायेगा उसमें अवश्यमेव सिद्धि और विजय मिलेगी। विष्टि की अंतिम तीन घड़ी शुभ होती हैं। ''शकुनि'' नामक करण जब कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को हो, उस रात्रि में शूरवीर योद्धाओं एवं दुश्मनों को भाग जाने के लिये प्रेरित करना, औषधियां ग्रहण करना, कोई वस्तु धारण करना, पक्षियों को पालना और युद्ध संबंधी सभी कार्य करना श्रेयस्कर होता है। ''चतुष्पद'' नामक करण यदि अमावस्या को दिन के समय हो तो तंत्रशास्त्रवेत्ता तांत्रिक विधि से अपने शत्रुनाश के लिये इसे उपयोगी मानते हैं, ऐसा उल्लेख मिलता है। चतुष्पद नामक करण में चतुष्पदों (चौपायों या पशुओं) से संबंधित हर प्रकार के कार्य करना हितकारी होता है। यदि श्राद्ध यानी तर्पणादि जलदान के सभी कार्य इस करण में किये जायें तो ज्यादा पुण्य मिलता है। ''नाग'' करण के देवता सर्प होते हैं। गारुड़ी विद्या जानने वालों के लिये यह करण सफलीभूत हो सकता है। लेकिन जन साधारण के लिये यह अशुभ ही है। इसमें कोई भी शुभ कार्य टालना चाहिये। ''कौस्तुभ''करण को किंस्तुघ्न नाम से पुकारते हैं। इसकी महत्ता वैश्वदेव नामक शुभ योगो से बहुत बढ़ जाती है। शुक्ल पक्ष की पहली तिथि प्रतिपदा को जब दिन के समय कौस्तुभ यानि किंस्तुघ्न करण हो तब यह योग बनता है जो सभी प्रकार के शुभ कार्यों को करने के लिये सर्वोत्तम माना जाता है। दुष्कर से भी दुष्कर कार्य इस करण/शुभ योग में शीघ्र सफल होते हैं। वार : आदित्यः सोमो भौमश्च तथा बुध बृहस्पतिः। भार्गवः शनैश्चरश्चैव एते सप्तदिनाधिपः॥ सूर्य, चंद्र, भौम, बुध, बुहस्पति, शुक्र और शनि ये क्रमशः रविवार आदि दिनों के स्वामी हैं। मुहूर्त के आधार पर सप्तवारों में कौन-कौन से विशिष्ट शुभ कार्य करना चाहिए जो लाभदायक एवम् सिद्धिदायक हों। संक्षिप्त रूप में उनका विवरण निम्नलिखित है। रविवार : दिनों का राजा सूर्य है। यदि प्रजा अपने राजा के दर्शन की इच्छुक हो तो उसे अपने रक्षक/ पालक प्रियराजा के दर्शन रविवार को करना चाहिए। हवनादि से संबंधित कार्य रविवार को करना शुभ होता है। सोमवार : उबटन लगाना, शृंगार की वस्तुएं खरीदना और उनका प्रयोग आरंभ करना, फलों का रस-पान या मधुर रसों का पान करना (रस पीना) मधुपान, बीज-वपन, वृक्षारोपण आदि कार्य शुभ होता है। मंगलवार : भेद नीति के कार्य, सेनापति का पद-ग्रहण अथवा सेना में पदग्रहण करना, व्यायाम, शस्त्राभ्यास आरंभ करने के लिये मंगलवार का दिन शुभ है। बुधवार : कन्या के विवाह आदि को तय करने की स्वीकारोक्ति बुधवार को शुभ मानी गई है। कोई कभी अपना सुहृद रहा हो और अब दुश्मन बन गया हो यदि उससे संधि करना हो तो प्रयास बुधवार से आरंभ करें। यदि रुठे को मनाना हो तो बुधवार को मनावें, शुभ फल की प्राप्ति होगी। नवीन वस्त्र धारण भी शुभ होता है। गुरुवार : अध्ययन, अध्यापन के कार्य का शुभारंभ, देवता की आराधना आरंभ करना, साधु-महात्मा एवं गुरुजनों से दीक्षा ग्रहण करना, सुंदर वस्त्राभूषणों का खरीदना, कृषि कार्य का प्रारंभ करना गुरुवार को प्रशस्त माना गया हैं। नव वस्त्राभूषण भी शुभ होता है। शुक्रवार : कन्यादान, प्रथम बार (पहले-पहल) अश्वारोहण, गजारोहण करना, घोड़े व हाथी का क्रय-विक्रय, नवीन परिधान धारण करना, गायन-वादन, नृत्यारम्भ करना शुभ। शनिवार : नगर, ग्राम, पुर में बसना, खंभे गाड़ना, गृहप्रवेश करना, शनिवार को शुभ फलदायक होता है। किसी चीज की स्थापना करना, हाथी लेना भी शनिवार को शुभ होता है । यात्रा मुहूर्त में तिथियों का विचार प्रथमा तिथि को प्रतिपदा, एकम अथवा परिवा या पड़वा के नाम से भी पुकारते है। इसमें बुद्धिमान/धैर्यवान मनुष्यों को किसी भी रूप में कभी भी यात्रा नहीं करनी चाहिये। द्वितीया तिथि यानि दोज के दिन यात्रा करना शुभ होता है। कार्य का सफल होना जानें। तृतीया (तीज) तिथि में यात्रा करना कल्याणकारक होता है। निरोगता का लाभ होता है। चतुर्थी की यात्रा मृत्युभयकारक होती है - ''चतुर्थी मरणाद्भयम्''॥ पंचमी के दिन यात्रा करना सर्वप्रकारेण सिद्धिप्रद होता है, विजय प्राप्ति होती है। षष्ठी तिथि के दिन यानि छठ के दिन की यात्रा हानिप्रद होती है। ''षष्ठीत्वं न लाभाय'' सप्तमी के दिन यात्रा करना यानी शुभ की बिदाई और अशुभ को न्यौता देने के समान है। अपवाद स्वरूप धार्मिक यात्रा की जा सकती है। अष्टमी के दिन यात्रा करने वाला स्वयं रोगग्रस्त हो सकता है, ''यात्रा रोगोत्पादक''। नवमी के दिन यात्रा करने वाले का मन लौटकर आने का नहीं होता, ''यात्रा में अडंगा'' पड़ जाता है। दशमी की यात्रा राजा को भूमि का लाभ कराती है, अन्यों को भूमि लाभ सदृश सुख की प्राप्ति होती है। एकादशी की यात्रा सदैव शुभ होती है। ''एकादशी तु सर्वत्र प्रशस्ता सर्व कर्मसु''। श्रेष्ठ फल मिलता है। द्वादशी की यात्रा धनहानि कराने वाली होती है- ''द्वादशीत्वर्थनाशाय''। त्रयोदशी की यात्रा सुलह, समझौता या संधि-कार्य हेतु शुभ मानी गई है। चतुर्दशी की यात्रा चलित-कार्यों में अर्थात् चर कार्यों में सफलता देती हैं। कौतुहल पूर्ण कार्यों के प्रयोग आदि को करने के उद्देश्य से की जाने वाली यात्राएं चतुर्दशी को सिद्धि प्रदान करती हैं, जैसे कोई कलाबाज, बाजीगर, या नटविद्या में प्रवीण कोई नटबेड़िया स्व-स्थान से प्रस्थान कर स्थान-स्थान पर भ्रमण करते हुये जगह जगह पर, अपने शरीर को विचित्र ढंगों से एवं कई तरह से मोड़-तोड़, सिकोड़कर अपने कलाकौशल से अद्भुत प्रदर्शन कर लोगों को मंत्रमुग्ध करता हुआ आगे बढ़ता जावे तो उन्हें चतुर्दशी तिथि को यात्रा सिद्धि प्रदान करने वाली साबित होगी। सामान्य रूप से जन साधारण के लिये चतुर्दशी के दिन यात्रा करना पूर्णरूपेण वर्जित रहता है जिसका कारण इस लेख की अंतिम कंडिका को पढ़ने से स्पष्ट हो जायेगा। मुहूर्त-विषयक उपरोक्त विवरण कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष अर्थात् दोनों पक्षों की प्रतिपदा तिथि से चतुर्दशी तिथि तक के लिये समान रूप से लागू होता है। अमावस्या तिथि के दिन भी यात्रा करना वर्जित है- ''अमावस्यां न यात्रा कुर्यात्''। पूर्णिमा तिथि को दिन में कभी भी, किसी भी कार्य से अथवा किसी भी उद्देश्य से यात्रा नहीं करनी चाहिये क्योंकि पूर्णमासी को दिन में यात्रा करना कार्य की असिद्धि का द्योतक है। शाश्वतता, शीतलता, शांति और शुभगता प्रदान करने वाली पूर्णमासी की रात्रिकालीन यात्रा को शिरोधार्य करना चाहिये। प्रतिदिन यात्रा करने वालों को मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं। ज्योतिष विज्ञान ने षष्ठी, अष्टमी, नवमी और चतुर्थी तिथियों को प्रत्येक पक्ष के छिद्र माना है, और चतुर्दशी तो शुभ योग/ नक्षत्र आदि से परिपूर्ण या युक्त होने पर भी सर्वथा निषिद्ध होती है। इस कारण से इनमें सर्व शुभ-कार्य, यात्रादि वर्जित हैं। कहा भी गया है- षडष्टौ नव चत्वारि पक्ष छिद्राणि वर्जयेत्। सापि नक्षत्रसम्पन्नां वर्जयेत्तु चतुर्दशीम्॥
गुरुवार, 19 मई 2011
चौपाई में समाई मंत्र शक्ति
विद्या प्राप्ति
गुरू गृह गए पढन रघुराई।
अलप काल विद्या सब आई।।
परीक्षा में सफलता
जेहि पर कृपा करहि जनु जानी।
कवि उर अजिर नचावहि बानी।।
मोरि सुधारिहि सा सब भांती।
जासु कृपा नहि कृपा अघाती।।
नजर दूर करने के लिए
स्याम गांर सुन्दर दोउ जोरी।
निरखहिं छबि जननी तृन तोरी।।
विपत्ति निवारण
जपहि नामु जन आरत भारी।
मिटाई कुसंकट होहि सुखारी।।
रोजगार
बिस्व भरण-पोषण कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।
गई बहोर गरीब नेवाजू।
सरल सबल साहिब रघुराजू।।
सुयोग्य वर
सुन सिय सत्य अशीश हमारी।
पूजहि मन कामना तिहारी।।
कुमार्ग से बचाव
रघुवसिन कर सुभाऊ।
मन कुपंथ पग धरहि न काऊ।।
दाम्पत्य जीवन में प्रेम
रामहि चितव माप जिहि सिया।
सो सनेहु सुख नहि कथानिया।।
यात्रा में सफलता
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
ह्वदय राखि कौसलपुर राजा।।
पुत्र प्राप्ति
प्रेम मग्न कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।
परिवार सुख
जबते राम ब्याहि घर आए।
नित नव मंगल मोद बढ़ाए।।
नवग्रह शांति
मोहि अनुचर कर केतिक बाता।
तेहि महं कुसमउ बाम विधाता।।
प्रेत बाधा निवारण
प्रनवऊं पवन कुमार खल वन पावक ज्ञान धन।
जासु ह्वदय आगार बसहि राम सर चापि धर।।
सर्व सिद्धि
भाव कुभाव अनख आलसहु।
नाम जपत मंगल दिशि दसहू।।
अनिष्ट भंजन
राजिव नैन धरै धनु सायक।
भगत विपत्ति भंजन सुखदायक।।
भ्रम निवारण
राम कथा सुन्दर करतारी।
संशय विहग उडावन हारी।।
गुरू गृह गए पढन रघुराई।
अलप काल विद्या सब आई।।
परीक्षा में सफलता
जेहि पर कृपा करहि जनु जानी।
कवि उर अजिर नचावहि बानी।।
मोरि सुधारिहि सा सब भांती।
जासु कृपा नहि कृपा अघाती।।
नजर दूर करने के लिए
स्याम गांर सुन्दर दोउ जोरी।
निरखहिं छबि जननी तृन तोरी।।
विपत्ति निवारण
जपहि नामु जन आरत भारी।
मिटाई कुसंकट होहि सुखारी।।
रोजगार
बिस्व भरण-पोषण कर जोई।
ताकर नाम भरत अस होई।।
गई बहोर गरीब नेवाजू।
सरल सबल साहिब रघुराजू।।
सुयोग्य वर
सुन सिय सत्य अशीश हमारी।
पूजहि मन कामना तिहारी।।
कुमार्ग से बचाव
रघुवसिन कर सुभाऊ।
मन कुपंथ पग धरहि न काऊ।।
दाम्पत्य जीवन में प्रेम
रामहि चितव माप जिहि सिया।
सो सनेहु सुख नहि कथानिया।।
यात्रा में सफलता
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
ह्वदय राखि कौसलपुर राजा।।
पुत्र प्राप्ति
प्रेम मग्न कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।
परिवार सुख
जबते राम ब्याहि घर आए।
नित नव मंगल मोद बढ़ाए।।
नवग्रह शांति
मोहि अनुचर कर केतिक बाता।
तेहि महं कुसमउ बाम विधाता।।
प्रेत बाधा निवारण
प्रनवऊं पवन कुमार खल वन पावक ज्ञान धन।
जासु ह्वदय आगार बसहि राम सर चापि धर।।
सर्व सिद्धि
भाव कुभाव अनख आलसहु।
नाम जपत मंगल दिशि दसहू।।
अनिष्ट भंजन
राजिव नैन धरै धनु सायक।
भगत विपत्ति भंजन सुखदायक।।
भ्रम निवारण
राम कथा सुन्दर करतारी।
संशय विहग उडावन हारी।।
बुधवार, 17 मार्च 2010
सहस्त्र नाम जप कैसे करें ?
ईश्वर को स्मरण या जप करने यूं तो कोई
एकमात्र निर्धारित ढंग नहीं है ,फिर भी किसी भी कार्य को इस ढंग से किया जाए ,जिस से वह सहज रूप से संपन्न हो
जाए l जपादि के
लिए भी ऐसी ही
चित्र वुत्ति निरोधक विधि हमारे ऋषि महर्षियों ने निर्धारित की है l इस विधि द्वारा जपादि करने से प्राणी
मात्र को एकाग्रत प्राप्त होती है ,जिस से हमें साधना का अनन्त फल प्राप्त होता
है ,जितनी अधिक
एकाग्रत होगी ,उतना ही
लाभ होगा l
श्री शिव सहस्त्रनाम पाठ करने के लिए सर्व प्रथम भगवान् शिव का आवाहन व् पूजा करें l पूजन में सर्व प्रथम आसन अर्पित करें ------------
श्री साम्ब सदाशिवाय नमः आसनं समर्पयामि तत्पश्चात पैर धोने ले लिए कल समर्पित करें --पाद्यं समर्प यामि, अघ्य्र समर्पयामि ,आचमन अर्पित करें --आचमनीयं समर्प यामि ,स्नान हेतु जल समर्पित करें --स्नानार्थ जलं समर्प यामि ,तिलक हेतु द्रव्य अर्पित करें ----गंधं समर्प यामि ,धुप -दीप दिखाएं -धूपं -दीपं दर्श यामि , प्रसाद अर्पित करें --नैवेद्यं निवेदयामि ,आचमन हेतु जल समर्पित करें ----आचमनीयं समर्पयामि तत्पश्चात नमस्कार करें --नमस्कारोमी l तत्पश्चात माला लेकर नाम जप अथवा पाठ करना चाहिए l जप या पाठ के लिए तुलसी या रुद्राक्ष की माला ही उत्तम मानी गयी है l माला दाहिने हाथ में धारण करनी चाहिए l श्री शिव सहस्त्रनाम युगों-युगों से अभिष्ट फल दायक है l
शिव सहस्त्रनाम -स्त्रोत्र
श्री शिव सहस्त्रनाम पाठ करने के लिए सर्व प्रथम भगवान् शिव का आवाहन व् पूजा करें l पूजन में सर्व प्रथम आसन अर्पित करें ------------
श्री साम्ब सदाशिवाय नमः आसनं समर्पयामि तत्पश्चात पैर धोने ले लिए कल समर्पित करें --पाद्यं समर्प यामि, अघ्य्र समर्पयामि ,आचमन अर्पित करें --आचमनीयं समर्प यामि ,स्नान हेतु जल समर्पित करें --स्नानार्थ जलं समर्प यामि ,तिलक हेतु द्रव्य अर्पित करें ----गंधं समर्प यामि ,धुप -दीप दिखाएं -धूपं -दीपं दर्श यामि , प्रसाद अर्पित करें --नैवेद्यं निवेदयामि ,आचमन हेतु जल समर्पित करें ----आचमनीयं समर्पयामि तत्पश्चात नमस्कार करें --नमस्कारोमी l तत्पश्चात माला लेकर नाम जप अथवा पाठ करना चाहिए l जप या पाठ के लिए तुलसी या रुद्राक्ष की माला ही उत्तम मानी गयी है l माला दाहिने हाथ में धारण करनी चाहिए l श्री शिव सहस्त्रनाम युगों-युगों से अभिष्ट फल दायक है l
शिव सहस्त्रनाम -स्त्रोत्र
सूतो वाच ----
श्रूयताम्रुषय : श्रेष्टा काठ यामि यथा श्रुतम l
विष्णुना प्रार्थितो ये न संतुष्ट पर मेश्वरा l
तदहं कथ याम्यद्य पुण्यं नाम सहस्त्र्कम l l
श्री विष्णु रुवाच --
शिवो हरो मृड़ो रूद्र पुष्कर :पुष्पलोचन l
अर्थिगम्य सदाचार शर्व शं भु र्म हेश्वर l l
चंद्रपीड शचन्द्रमौलीर्वीश्वं विश्वा मरेश्श्वर l
श्रूयताम्रुषय : श्रेष्टा काठ यामि यथा श्रुतम l
विष्णुना प्रार्थितो ये न संतुष्ट पर मेश्वरा l
तदहं कथ याम्यद्य पुण्यं नाम सहस्त्र्कम l l
श्री विष्णु रुवाच --
शिवो हरो मृड़ो रूद्र पुष्कर :पुष्पलोचन l
अर्थिगम्य सदाचार शर्व शं भु र्म हेश्वर l l
चंद्रपीड शचन्द्रमौलीर्वीश्वं विश्वा मरेश्श्वर l
वेदां तसार संदोह कपाली नीलालोहित l l
ध्यान धारो परिछेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वर l
अष्टमूर्ती विश्वामूर्तीस्त्रिवर्ग स्वर्ग साधन l l
ज्ञान गम्यो दृढ़ प्रज्ञो देवदेव स्त्रीलोचन l
वामदेवो महादेव पटु पारी वृढो दृढ l l
विश्व रूपों विरूपाक्षे वागीश शुचि सत्तम l
सर्व प्रमाणसं वादी वृषाड को वृष वाहन l l
ईश पिनाकी खट वांगी चित्र वेष श्चिरन्तन l
तमो हारी महायोगी गोप्ता ब्रह्माच धूर्जटि l l
काल काल कृत्तिवासा सुभग प्रण वात्मक l
उत्र्ध्र पुरुषो जुष्यों दुर्व्रा सा पुर शासन l l
दिव्यायुध स्कन्द गुरु पर मेंशठीपरात्पर l
अनादि मध्यानिधनो गिरीशो गिरि जाधव l l
कुबेर बंधु श्री कंन्ठो लोक वर्नोत्तमो मृदु l
समा धिवेद्य को दण्डी नील कंठा परस्वाधी l l
विशालाक्षे मृगव्याध सुरेश सूर्यतापन l
धर्म धामक्षेत्रं भगवानभं गनेत्र्भित l l
उग्र पशु पतिस्ताक्षर्य प्रिय भक्त परं तप ल
डाटा दयाकारो दक्ष कपर्दी काम शासन l l
शम शान निलय सूक्ष्म श्मशान स्थो महेश्वर l
लोक कर्त्ता मृग पतिर्म हाकर्त्ता महौषधि l l
उत्तरों गोपतिर्गोप्ता ज्ञागम्य पुरातन l
नीति सुनीति शुद्धात्मा सोम : रत सुखी l l
सोमयो मृतप सौम्यो महाते जा महाद्युति l
ध्यान धारो परिछेद्यो गौरीभर्ता गणेश्वर l
अष्टमूर्ती विश्वामूर्तीस्त्रिवर्ग स्वर्ग साधन l l
ज्ञान गम्यो दृढ़ प्रज्ञो देवदेव स्त्रीलोचन l
वामदेवो महादेव पटु पारी वृढो दृढ l l
विश्व रूपों विरूपाक्षे वागीश शुचि सत्तम l
सर्व प्रमाणसं वादी वृषाड को वृष वाहन l l
ईश पिनाकी खट वांगी चित्र वेष श्चिरन्तन l
तमो हारी महायोगी गोप्ता ब्रह्माच धूर्जटि l l
काल काल कृत्तिवासा सुभग प्रण वात्मक l
उत्र्ध्र पुरुषो जुष्यों दुर्व्रा सा पुर शासन l l
दिव्यायुध स्कन्द गुरु पर मेंशठीपरात्पर l
अनादि मध्यानिधनो गिरीशो गिरि जाधव l l
कुबेर बंधु श्री कंन्ठो लोक वर्नोत्तमो मृदु l
समा धिवेद्य को दण्डी नील कंठा परस्वाधी l l
विशालाक्षे मृगव्याध सुरेश सूर्यतापन l
धर्म धामक्षेत्रं भगवानभं गनेत्र्भित l l
उग्र पशु पतिस्ताक्षर्य प्रिय भक्त परं तप ल
डाटा दयाकारो दक्ष कपर्दी काम शासन l l
शम शान निलय सूक्ष्म श्मशान स्थो महेश्वर l
लोक कर्त्ता मृग पतिर्म हाकर्त्ता महौषधि l l
उत्तरों गोपतिर्गोप्ता ज्ञागम्य पुरातन l
नीति सुनीति शुद्धात्मा सोम : रत सुखी l l
सोमयो मृतप सौम्यो महाते जा महाद्युति l
तेजो मयो मृतमयो त्रमयस्च सुधापति l l
अजात शत्रु रालो क संभाव्यो हव्य वाहन l
लोक करो वेद्कर सूत्रकार सनातन l l
महर्षि कपिलाचार्यो विश्वदीप्ति स्रिलोचन l
पिनाकपाणिर्भूदेव स्वस्तिद स्वस्ति कृत्स्युधी l l
धात्रु धामा धामकर सर्वग सर्व गोचर l
ब्रह्म स्रुग्विश्वस्रू क्सर्ग कर्निकार प्रिय कवि l l
शाखों विशाखो गोशाख शिवो भिषगनुत्तम l
गड गाप्ल्वो दको भव्य पुष्कल स्थपति शिथिर l l
विजितात्मा विषायात्मा तवाह नसारथि l
सगणो गण कायशच सुकीर्ति श्छित्रसं शय l l
कामदेव कामपालो भस्मो द्वालित विग्रह l
भस्म प्रियो भस्मशायी उमापति कृतागम l l
समावर्तो निव्रुत्तात्मा धर्म पुज सदाशिव l
अकल्मषशचतर्बाह दुर्धर्षो दुरासद l l
दुर्लभो दुर्गमो दुर्ग सर्वा युध विशारद l
अध्यात्मयोग निलय सुतंतु स्तन्तु वर्धन l l
शुभां गोलोक सारंगो जगदीशो जनार्दन l
भस्म शुद्दीकरो मेरूरो जसवी शुद्ध विग्रह l l
असाध्य साधु साध्य्श्च भ्रुत्य्मर्क टरू पध्रुक l
हिरण्य रेता पौराणो रिपूजीत हरो बल l l
महाह्रदो महागर्त्त सिद्ध वृन्दार वंदित l
व्याघ्रचरमाम्बरो व्याली महाभूतो महा निधि l l
अमृतांशो मृत वपु पांच जन्य प्रभंजन l
अजात शत्रु रालो क संभाव्यो हव्य वाहन l
लोक करो वेद्कर सूत्रकार सनातन l l
महर्षि कपिलाचार्यो विश्वदीप्ति स्रिलोचन l
पिनाकपाणिर्भूदेव स्वस्तिद स्वस्ति कृत्स्युधी l l
धात्रु धामा धामकर सर्वग सर्व गोचर l
ब्रह्म स्रुग्विश्वस्रू क्सर्ग कर्निकार प्रिय कवि l l
शाखों विशाखो गोशाख शिवो भिषगनुत्तम l
गड गाप्ल्वो दको भव्य पुष्कल स्थपति शिथिर l l
विजितात्मा विषायात्मा तवाह नसारथि l
सगणो गण कायशच सुकीर्ति श्छित्रसं शय l l
कामदेव कामपालो भस्मो द्वालित विग्रह l
भस्म प्रियो भस्मशायी उमापति कृतागम l l
समावर्तो निव्रुत्तात्मा धर्म पुज सदाशिव l
अकल्मषशचतर्बाह दुर्धर्षो दुरासद l l
दुर्लभो दुर्गमो दुर्ग सर्वा युध विशारद l
अध्यात्मयोग निलय सुतंतु स्तन्तु वर्धन l l
शुभां गोलोक सारंगो जगदीशो जनार्दन l
भस्म शुद्दीकरो मेरूरो जसवी शुद्ध विग्रह l l
असाध्य साधु साध्य्श्च भ्रुत्य्मर्क टरू पध्रुक l
हिरण्य रेता पौराणो रिपूजीत हरो बल l l
महाह्रदो महागर्त्त सिद्ध वृन्दार वंदित l
व्याघ्रचरमाम्बरो व्याली महाभूतो महा निधि l l
अमृतांशो मृत वपु पांच जन्य प्रभंजन l
पंच विशांतितत्त्वस्थ पारिजात पारावर l l
सुलभ सुव्रत शूरो ब्रह्मवेद निधिर्निधि l
वर्णाश्र मगुरुर्वर्णी वायु वाहन l l
धनुर्धरोधनु र्वे दो गुण राशिर्गुणा कर l
सत्य सत्यपरो दीनो धर्मा गोधर्म साधन l l
अनन्त दृष्टिरा नन्दों दंडो दमयिता दम l
अभिवाद्यों महा मायो विश्वकर्मा विशारद l l
वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भृत भावन l
उन्मत्त्वे ष प्रच्छत्रो जितकामो जित प्रिय l l
कल्याण प्रकृति कल्प सर्व लोक प्रजापति l
तप्स्वीतार को धीमा न्प्रधान प्रभु रव्यय l l
लोक पालो न्तर्हीतात्मा कल्पादों कमलेक्षण l
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो नियमो नियाताश्रय l l
चंद्र सूर्य शनि केतुर्व रांगो विदु मच्छवि l
भक्ति वश्य पर ब्रह्म मृग बाणार्पणोनध
अद्रिर द्यालय कांत परमात्मा जगद गुरु l
सर्व कर्मा लयस्तुष्टो मंगल्यो मड गलावृत l l
महात पादीर्घ तपा स्थ विष्ट स्थविरो धुप l
अह संवत्सरो व्याप्ति प्रमाणं परमं तप l l
संवत्सर करो मंत्र प्रत्यय सर्व दर्शन l
अज सर्वेश्वर सिद्धो महा रेता महाबल l l
योगीयोग्यो महाते जा: सिद्धि सर्वा दिर गृह l
वसुर्व सुमना सत्य सर्व पापहरो हर l l
सुकीर्ती शोभन श्रीमान वाड मनस गोचर l
सुलभ सुव्रत शूरो ब्रह्मवेद निधिर्निधि l
वर्णाश्र मगुरुर्वर्णी वायु वाहन l l
धनुर्धरोधनु र्वे दो गुण राशिर्गुणा कर l
सत्य सत्यपरो दीनो धर्मा गोधर्म साधन l l
अनन्त दृष्टिरा नन्दों दंडो दमयिता दम l
अभिवाद्यों महा मायो विश्वकर्मा विशारद l l
वीतरागो विनीतात्मा तपस्वी भृत भावन l
उन्मत्त्वे ष प्रच्छत्रो जितकामो जित प्रिय l l
कल्याण प्रकृति कल्प सर्व लोक प्रजापति l
तप्स्वीतार को धीमा न्प्रधान प्रभु रव्यय l l
लोक पालो न्तर्हीतात्मा कल्पादों कमलेक्षण l
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो नियमो नियाताश्रय l l
चंद्र सूर्य शनि केतुर्व रांगो विदु मच्छवि l
भक्ति वश्य पर ब्रह्म मृग बाणार्पणोनध
अद्रिर द्यालय कांत परमात्मा जगद गुरु l
सर्व कर्मा लयस्तुष्टो मंगल्यो मड गलावृत l l
महात पादीर्घ तपा स्थ विष्ट स्थविरो धुप l
अह संवत्सरो व्याप्ति प्रमाणं परमं तप l l
संवत्सर करो मंत्र प्रत्यय सर्व दर्शन l
अज सर्वेश्वर सिद्धो महा रेता महाबल l l
योगीयोग्यो महाते जा: सिद्धि सर्वा दिर गृह l
वसुर्व सुमना सत्य सर्व पापहरो हर l l
सुकीर्ती शोभन श्रीमान वाड मनस गोचर l
अमृत शास्वत शान्तो बाणहस्त प्रतापवान l l
कमंडलू धरो धन्वी वेदांगो वेदविन्मुनी l
भ्राजिष्णु र्भोजनं भिकता लोक नाथो दुराधर l l
अतीन्द्रियो महामाय सर्व वासशच्तु षपथ l
कालयोगी महानादो महो त्साहो महाबल l l
महाबुद्धिर्म हावीर्यो भूतचारी पुरन्दर l
निशाचर प्रेत चारी महा शक्तिर्म हांद्युति l l
अनिर्दे श्यवपु श्री मान्सर्वाचार्य मनो गति l
बहु श्रुतो महामायो नियतात्माधू वो ध्रुव l l
ओजस्ते जाद्यु तिधरो नर्तक सर्व शासक l
नृत्य प्रियो नृत्यनित्य प्रकाशात्मा प्रकाशक l l
स्पष्टाक्षरो बुधो मंत्र समान सार संकल्प l
युगादि कृद्युगावर्तो गंभीरो वृष वाहन l l
इष्टो विशिष्ट शिष्टेष्ट शलभ शरभोधनु l
तीर्थ रूपस्तीर्थ नामा तीर्थ दृश्य स्तुतोर्थ द l l
अपां निधिर धिष्ठान विजयो जय्कालवित l
प्रतिष्टित प्रमाणज्ञो हिरण्य कवचो हरि l l
विमोचन सुरगणों विद्यैशो बिंदु संश्रय l
बाल रूपों बालो न्मत्तो विकर्ता गहनों गृह l l
करणं कारणं कर्ता सर्व बन्ध विमोचन l
व्यवसायों व्यवस्थान स्थानदो जगदादिज l l
गुरदो ललितो भेदों भावात्मातनि संस्थित l
वीरे श्वरो वीर भद्रो वीरासन विधिर्विराट l l
वीरचूडामणिर्वेत्ता तीव्रनान्दो नदीधर l
कमंडलू धरो धन्वी वेदांगो वेदविन्मुनी l
भ्राजिष्णु र्भोजनं भिकता लोक नाथो दुराधर l l
अतीन्द्रियो महामाय सर्व वासशच्तु षपथ l
कालयोगी महानादो महो त्साहो महाबल l l
महाबुद्धिर्म हावीर्यो भूतचारी पुरन्दर l
निशाचर प्रेत चारी महा शक्तिर्म हांद्युति l l
अनिर्दे श्यवपु श्री मान्सर्वाचार्य मनो गति l
बहु श्रुतो महामायो नियतात्माधू वो ध्रुव l l
ओजस्ते जाद्यु तिधरो नर्तक सर्व शासक l
नृत्य प्रियो नृत्यनित्य प्रकाशात्मा प्रकाशक l l
स्पष्टाक्षरो बुधो मंत्र समान सार संकल्प l
युगादि कृद्युगावर्तो गंभीरो वृष वाहन l l
इष्टो विशिष्ट शिष्टेष्ट शलभ शरभोधनु l
तीर्थ रूपस्तीर्थ नामा तीर्थ दृश्य स्तुतोर्थ द l l
अपां निधिर धिष्ठान विजयो जय्कालवित l
प्रतिष्टित प्रमाणज्ञो हिरण्य कवचो हरि l l
विमोचन सुरगणों विद्यैशो बिंदु संश्रय l
बाल रूपों बालो न्मत्तो विकर्ता गहनों गृह l l
करणं कारणं कर्ता सर्व बन्ध विमोचन l
व्यवसायों व्यवस्थान स्थानदो जगदादिज l l
गुरदो ललितो भेदों भावात्मातनि संस्थित l
वीरे श्वरो वीर भद्रो वीरासन विधिर्विराट l l
वीरचूडामणिर्वेत्ता तीव्रनान्दो नदीधर l
आज्ञा धार स्त्रिशूलीच शिपिविष्ट शिवालय l l
बाल खिल्यो म्हाचाप स्तिग्मां शुर्ब धिर खग l
अभिराम सुशरण सुब्रह्मणय सुधापति l l
मघवान्कौ शिको गोमान्विराम सर्व साधन l
लालाटाक्षो विश्व्देह सार संचार चक्र भृत l l
अमोघंद डो मध्य स्थो हिरण्यो ब्रह्म वर्चसी l
परमार्थ पारो माई शंबरो व्याघ्र लोचन l l
रुचिर्वीरं चि स्वर्र्बन्धुर्वा चस्पतिर हर्पति l
रविर्विचन स्कंद शास्ता वैवस्तोयम l l
युक्तिरुत्रत कीर्तीश्च सानु राग परं जय l
कैलास साधिपति कान्त सविता रविलोचन l l
विद्धत्तमो वीत भयो विश्व भर्त्ता निवारित l
नित्यो नियत कल्याण पुण्य श्रवण कीर्तन l l
दूर श्रवा विश्व सहोध्ये यो दुस्वप्न नाशन l
उत्तराणो दृष्क्रु तिहा विज्ञो यो दू: सहो भव l l
अनादिभूर्भू वो लक्ष्मी किरीटीत्रिदशाधिप l
विश्वगोप्ता विश्वकर्ता सुवीरो रुचिरांगद l l
जननी जनजन्मादी प्रीतिमात्रीतिमान्धव l
वसिष्ट कश्यपो भानु र्भीमो भीम पराक्रम l l
प्रणव : सत्प्था चारो महा कोशो महाधन l
जन्माधिपो महादेव सकला गमपारग l l
तत्त्वं त्त्व्विदेकात्मा विभु र्विश्व भूषन l
ऋषीर्ब्राह्मण ऐश्वर्य जन्म मृत्यु जरागित l l
बाल खिल्यो म्हाचाप स्तिग्मां शुर्ब धिर खग l
अभिराम सुशरण सुब्रह्मणय सुधापति l l
मघवान्कौ शिको गोमान्विराम सर्व साधन l
लालाटाक्षो विश्व्देह सार संचार चक्र भृत l l
अमोघंद डो मध्य स्थो हिरण्यो ब्रह्म वर्चसी l
परमार्थ पारो माई शंबरो व्याघ्र लोचन l l
रुचिर्वीरं चि स्वर्र्बन्धुर्वा चस्पतिर हर्पति l
रविर्विचन स्कंद शास्ता वैवस्तोयम l l
युक्तिरुत्रत कीर्तीश्च सानु राग परं जय l
कैलास साधिपति कान्त सविता रविलोचन l l
विद्धत्तमो वीत भयो विश्व भर्त्ता निवारित l
नित्यो नियत कल्याण पुण्य श्रवण कीर्तन l l
दूर श्रवा विश्व सहोध्ये यो दुस्वप्न नाशन l
उत्तराणो दृष्क्रु तिहा विज्ञो यो दू: सहो भव l l
अनादिभूर्भू वो लक्ष्मी किरीटीत्रिदशाधिप l
विश्वगोप्ता विश्वकर्ता सुवीरो रुचिरांगद l l
जननी जनजन्मादी प्रीतिमात्रीतिमान्धव l
वसिष्ट कश्यपो भानु र्भीमो भीम पराक्रम l l
प्रणव : सत्प्था चारो महा कोशो महाधन l
जन्माधिपो महादेव सकला गमपारग l l
तत्त्वं त्त्व्विदेकात्मा विभु र्विश्व भूषन l
ऋषीर्ब्राह्मण ऐश्वर्य जन्म मृत्यु जरागित l l
पंचयज्ञससु त्पत्तिविर्श्वेशो विमलोदय l
आत्मयो नीर नाद्यान्तो वत्सलो भक्त्लोक धृक l l
गायत्री वल्लभ प्रांशु र्विश्वास प्रभाकर l
शीशीर्गिरि रत सम्राट सुषेण सुर शत्रु हा l l
अमोघो रिष्टने मिशच कुमुदों विगतज्वर l
स्वयं ज्योति स्तनु र्ज्योतिरात्मज्योतिर चंचल l l
पिंगल कपिलशमश्रुर्भालने त्रस्त्रयीतन l
ज्ञान स्कन्दो महानीतिर्विश्वो त्पत्ति रुपप्लाव l l
भगो विवास्तानादित्यो योग पारो दिवस्पति l
कल्याणगुण नामाच पापहा पुण्य दर्शन l l
उदार कीर्ति रुद्यो गी सद्यो गीसद्सन्मय l
नक्षत्र मालीनाकेश: स्वाधिटान पदाश्रय l l
पवित्र पापहारीच मणिपूरो नभो गति l
ह्र्त्पूडरी कमासीन शक्र शांतो वृषा कपि l l
उष्णो गृह पति कृष्ण समर्थ नर्थ नाशन l
अधर्म शत्रु रक्षेय पुरुहूत पुरुश्रुत l l
ब्रह्मगर्भो बृहद गर्भो धर्म धेनुर्ध नागम l
जगद्दीतैषी सुगत कुमार कुशलागम l l
हिरण्यवर्णों ज्योतिष्मात्रानाभु तर तो ध्वनि l
अरागो नयनाध्यक्षो विश्वामित्रो धनेस्वर l l
ब्रह्म्ज्योतिर्व सुधामा माहाज्योतिर नुत्तम l
माता महो मात रिश्वा नभ स्वात्राग हार धृक l l
पुलस्त्य पुलहो गस्त्यो जातू कनर्य पराशर l
निरावरण निर्वारो वैरं च्यो विष्टर श्रवा l l
आत्मयो नीर नाद्यान्तो वत्सलो भक्त्लोक धृक l l
गायत्री वल्लभ प्रांशु र्विश्वास प्रभाकर l
शीशीर्गिरि रत सम्राट सुषेण सुर शत्रु हा l l
अमोघो रिष्टने मिशच कुमुदों विगतज्वर l
स्वयं ज्योति स्तनु र्ज्योतिरात्मज्योतिर चंचल l l
पिंगल कपिलशमश्रुर्भालने त्रस्त्रयीतन l
ज्ञान स्कन्दो महानीतिर्विश्वो त्पत्ति रुपप्लाव l l
भगो विवास्तानादित्यो योग पारो दिवस्पति l
कल्याणगुण नामाच पापहा पुण्य दर्शन l l
उदार कीर्ति रुद्यो गी सद्यो गीसद्सन्मय l
नक्षत्र मालीनाकेश: स्वाधिटान पदाश्रय l l
पवित्र पापहारीच मणिपूरो नभो गति l
ह्र्त्पूडरी कमासीन शक्र शांतो वृषा कपि l l
उष्णो गृह पति कृष्ण समर्थ नर्थ नाशन l
अधर्म शत्रु रक्षेय पुरुहूत पुरुश्रुत l l
ब्रह्मगर्भो बृहद गर्भो धर्म धेनुर्ध नागम l
जगद्दीतैषी सुगत कुमार कुशलागम l l
हिरण्यवर्णों ज्योतिष्मात्रानाभु तर तो ध्वनि l
अरागो नयनाध्यक्षो विश्वामित्रो धनेस्वर l l
ब्रह्म्ज्योतिर्व सुधामा माहाज्योतिर नुत्तम l
माता महो मात रिश्वा नभ स्वात्राग हार धृक l l
पुलस्त्य पुलहो गस्त्यो जातू कनर्य पराशर l
निरावरण निर्वारो वैरं च्यो विष्टर श्रवा l l
अत्म्भूर निरुद्दो त्रिर्ज्ञान मूर्तिर्म हायशा l
लोकावीरा ग्राणीर्वीरशचंड सत्य पराक्रम l l
व्यालाकल्पो महाकल्पं कल्पवृक्ष कलाधर l
अलंक रिष्णु रचलो रोचिष्णु र्विक्रमोत्रत l l
आयु शब्द पतिर्वेणीप्लवन शिखी सारथि l
असं सृष्टा तिथि शक्र प्रमाथी पाद पासन l l
वासु श्रवा हव्यवाह प्रतप्ता विश्व भोजन l
जप्यो ज़रा दिश मनो लो हितात्मा तनून पात l l
ब्रुहदश्वो नभो योनि सुप्रतीक स्तामिस्त्र्हा l
निदाघस्तपनो मेघ स्वक्ष शिशिरात्मक l l
सुस्वनिल सुनिष्प्त्र सुरभि शिशिरात्मक l
वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहन l l
अं गिरा गुरुरात्रे यो विमलो विश्वपावन l
पावन : सुमतिर्विद्दा स्त्री विद्यो नर वाहन l l
मनो बुद्दिर हंकार क्षेत्रज्ञ क्षेत्र पालक l
जमद्ग्निर्ब लनिधिर्विगालो विश्व्गालाव l l
अघोरो नुत्तरो यज्ञ श्रे यो निश्रेय सांपथ l
शैलो गगन कुन्दाभो दान वारि ररीं दम l l
रजनीजन कशचारु विशल्यो लोक कल्पधृक l
चतुर्वेद दश्च चतुर्भा वश्चतुर रश चतुर प्रिय l l
आम्नायोथ समाम्नाय स्तीर्थ देव शिवालय l
बहु रूपों महा रूप सर्व रूपश्चराचर l l
न्यायनिर्मायको न्यायी न्याय गम्यो निरंतर l
सहस्त्र मूर्धा देवेन्द्र सर्व शास्त्र प्रभंजन l l
लोकावीरा ग्राणीर्वीरशचंड सत्य पराक्रम l l
व्यालाकल्पो महाकल्पं कल्पवृक्ष कलाधर l
अलंक रिष्णु रचलो रोचिष्णु र्विक्रमोत्रत l l
आयु शब्द पतिर्वेणीप्लवन शिखी सारथि l
असं सृष्टा तिथि शक्र प्रमाथी पाद पासन l l
वासु श्रवा हव्यवाह प्रतप्ता विश्व भोजन l
जप्यो ज़रा दिश मनो लो हितात्मा तनून पात l l
ब्रुहदश्वो नभो योनि सुप्रतीक स्तामिस्त्र्हा l
निदाघस्तपनो मेघ स्वक्ष शिशिरात्मक l l
सुस्वनिल सुनिष्प्त्र सुरभि शिशिरात्मक l
वसन्तो माधवो ग्रीष्मो नभस्यो बीजवाहन l l
अं गिरा गुरुरात्रे यो विमलो विश्वपावन l
पावन : सुमतिर्विद्दा स्त्री विद्यो नर वाहन l l
मनो बुद्दिर हंकार क्षेत्रज्ञ क्षेत्र पालक l
जमद्ग्निर्ब लनिधिर्विगालो विश्व्गालाव l l
अघोरो नुत्तरो यज्ञ श्रे यो निश्रेय सांपथ l
शैलो गगन कुन्दाभो दान वारि ररीं दम l l
रजनीजन कशचारु विशल्यो लोक कल्पधृक l
चतुर्वेद दश्च चतुर्भा वश्चतुर रश चतुर प्रिय l l
आम्नायोथ समाम्नाय स्तीर्थ देव शिवालय l
बहु रूपों महा रूप सर्व रूपश्चराचर l l
न्यायनिर्मायको न्यायी न्याय गम्यो निरंतर l
सहस्त्र मूर्धा देवेन्द्र सर्व शास्त्र प्रभंजन l l
मुण्डो विरूपो विक्रान्तो दण्डीदान्तो गुणोंत्तम l
पिंगलाक्षो जनाध्यक्षो नील ग्रीवो निरामय l l
सहस्त्रबाहु सर्वेश शरण्य सर्व लोक धृक l
पद मासन परम ज्योति पारंपार परं फलम l l
पदमगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षण l
चराचरज्ञो वर दो वरे शस्तु महाबल l l
देवासु रागुरिर्दे वो देवासुर महाश्रय l
देवादि देवो देवाग्निर्दे वाग्नि सुखद प्रभु l l
देवासुरे श्वरो दिव्यो देवासुर महेश्वर l
देवदेव् मयो चिन्त्यो देवदेवात्मसम्भव l l
सद्यो निरसुर व्याघ्रो देव सिंहो दिवाकर l
विबुधाग्रवर श्रेष्ठ सर्व देवोत्तामोत्तम l l
शिव ज्ञान रत श्री मव्च्छिखी श्री पर्वत प्रिय l
वज्र हस्त सिद्दिखडगनर सिंहनिपातन l l
लिंगाध्यक्ष सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावह l
स्वधर्म स्वर्गत स्वर स्वर मयस्वन l l
बाणाध्यक्षो बीजकर्ता धर्म कृद्दर्म संभव l
दंभो लोभार्थ विच्छमक्ष सर्व भूत महेश्वर l l
श्मशान निलयस्त्र्यक्ष सेतुर प्रति माकृति l
लोकोत्तर स्फुटालो स्त्रयां बको नागभूषण l l
अंधकारिर्म खद्दे षी विष्णु कन्धर पातन l
हीनदोषो क्षयगुणों दक्षारि पूषदं त भित l l
धूर्जटि खण्डपरशु सकलो निष्कली नघ l
अकाल सकलाधार पांडुराभो मृड़ो नट l l
पिंगलाक्षो जनाध्यक्षो नील ग्रीवो निरामय l l
सहस्त्रबाहु सर्वेश शरण्य सर्व लोक धृक l
पद मासन परम ज्योति पारंपार परं फलम l l
पदमगर्भो महागर्भो विश्वगर्भो विचक्षण l
चराचरज्ञो वर दो वरे शस्तु महाबल l l
देवासु रागुरिर्दे वो देवासुर महाश्रय l
देवादि देवो देवाग्निर्दे वाग्नि सुखद प्रभु l l
देवासुरे श्वरो दिव्यो देवासुर महेश्वर l
देवदेव् मयो चिन्त्यो देवदेवात्मसम्भव l l
सद्यो निरसुर व्याघ्रो देव सिंहो दिवाकर l
विबुधाग्रवर श्रेष्ठ सर्व देवोत्तामोत्तम l l
शिव ज्ञान रत श्री मव्च्छिखी श्री पर्वत प्रिय l
वज्र हस्त सिद्दिखडगनर सिंहनिपातन l l
लिंगाध्यक्ष सुराध्यक्षो योगाध्यक्षो युगावह l
स्वधर्म स्वर्गत स्वर स्वर मयस्वन l l
बाणाध्यक्षो बीजकर्ता धर्म कृद्दर्म संभव l
दंभो लोभार्थ विच्छमक्ष सर्व भूत महेश्वर l l
श्मशान निलयस्त्र्यक्ष सेतुर प्रति माकृति l
लोकोत्तर स्फुटालो स्त्रयां बको नागभूषण l l
अंधकारिर्म खद्दे षी विष्णु कन्धर पातन l
हीनदोषो क्षयगुणों दक्षारि पूषदं त भित l l
धूर्जटि खण्डपरशु सकलो निष्कली नघ l
अकाल सकलाधार पांडुराभो मृड़ो नट l l
पूर्ण पूरयिता पुण्य सुकुमार सुलोचन l
सामगेय प्रियो क्रूर पुण्य कीर्तिर नामय l l
मनो जवास्तीर्थ करो जटिल जीवितेश्वर l
जीवितन्तकारो नित्यो वसुरेता वसुप्रद l l
सदगति स्कृति सिद्दि सज्जति काल कण्टक l
कलाधारो महाकालो भूत सत्य परायण l l
लोकलावन्य कर्ता चलो कोत्तर सुखालय l
चन्द्रसं जीवन शास्ता लोक गूढो महाधिप l l
लोकबन्धु र्लोक नाथ कृतज्ञ कीर्तीभूषण l
अनपायो क्षर कान्त सर्व शास्त्र भ्रुताम वर l l
तेजो मयोद्यु तिधरो लोक नाम ग्रणीरणु l
शचिस्मित प्रसत्रात्मादुर्जो यो दुरतिक्रम l l
ज्योतिर्म योज गन्नाथो निराकारो जलेश्वर l
तुम्बवीणो महाकोपो विशोक शोक नाशन l l
त्रिलोक कप्स्त्रिलोकेश सर्वशुद्दिर धोक्षज l
अव्यक्तक्षणों देवो व्यक्तो विशांपति l l
वर शीलो वर गुण सारो मान्धानो मय l
ब्रह्म विष्णु प्रजापालो हंसो हं सगातिर्वय l l
वेधा विधाता चं स्त्रष्टा हर्त्ता चतुर्मुख l
कैलास शिखरा वासी सर्वा वासी सदा गति l l
हिरण्य गर्भो दुहिणो भूत्पालो थ भूपति l
सद्योगी योग विद्योगी वर दो ब्राह्मण प्रिय l l
देवप्रियो देवनाथो देवज्ञो देव चिन्तक l
विषमाक्षो विशालाक्षो वृषदो वृश्ह वर्धन l l
सामगेय प्रियो क्रूर पुण्य कीर्तिर नामय l l
मनो जवास्तीर्थ करो जटिल जीवितेश्वर l
जीवितन्तकारो नित्यो वसुरेता वसुप्रद l l
सदगति स्कृति सिद्दि सज्जति काल कण्टक l
कलाधारो महाकालो भूत सत्य परायण l l
लोकलावन्य कर्ता चलो कोत्तर सुखालय l
चन्द्रसं जीवन शास्ता लोक गूढो महाधिप l l
लोकबन्धु र्लोक नाथ कृतज्ञ कीर्तीभूषण l
अनपायो क्षर कान्त सर्व शास्त्र भ्रुताम वर l l
तेजो मयोद्यु तिधरो लोक नाम ग्रणीरणु l
शचिस्मित प्रसत्रात्मादुर्जो यो दुरतिक्रम l l
ज्योतिर्म योज गन्नाथो निराकारो जलेश्वर l
तुम्बवीणो महाकोपो विशोक शोक नाशन l l
त्रिलोक कप्स्त्रिलोकेश सर्वशुद्दिर धोक्षज l
अव्यक्तक्षणों देवो व्यक्तो विशांपति l l
वर शीलो वर गुण सारो मान्धानो मय l
ब्रह्म विष्णु प्रजापालो हंसो हं सगातिर्वय l l
वेधा विधाता चं स्त्रष्टा हर्त्ता चतुर्मुख l
कैलास शिखरा वासी सर्वा वासी सदा गति l l
हिरण्य गर्भो दुहिणो भूत्पालो थ भूपति l
सद्योगी योग विद्योगी वर दो ब्राह्मण प्रिय l l
देवप्रियो देवनाथो देवज्ञो देव चिन्तक l
विषमाक्षो विशालाक्षो वृषदो वृश्ह वर्धन l l
असंख्यों यो प्रमे यात्मार्वीय वान्वीय कोविद l
वेद्यशचै व् वियोगात्मा परावर पामु नीश्वर l l
अनुत्तमो दुराधर्षो मधुर प्रिय दर्शन l
सुरेश शरणं सर्व शब्द ब्रह्म सतां गति l l
कालपक्ष काल्कारीकं कणीकृत वासु कि l
महेष्वासो मही भर्ता निष्कलं को विश्रुड खल l l
द्युमणिस्तर णिर्धन्य सिद्दिद सिद्धि साधन l
विश्वत संवृत स्तुत्यो व्यूढो रस्को महा भुज l l
सर्व योनिर्निरांत को नर नारायाण प्रिय l
निर्लेपो निष्प्रपंचात्मा निर्व्य गोव्यड गनाशन l l
स्तव्य स्तवप्रिय स्तोता व्यास्मूर्ति निरं कुश l
नीरवद्यमयो पायो विद्याराशीर सप्रिय l l
प्रशान्तबुद्दिर क्षुणसं ग्रही नित्य सुन्दर l
वैयाध्रुर्यो दात्रीश शाकल्य शर्वरी पति l l
परमार्थ गुरुर्द्रष्टि शरीराश्रित वत्सल l
सोमो रसज्ञो रसद सर्व सत्तावलंबन l l
एवं नान्मास हस्त्रेणतुष्टाव वृषभध्वजम l
प्रार्थ यामास शंभूच पूज यामास पंकजै l l
परीक्षार्थ हरे स्तवीश कमलेषु महेश्वर l
गोपयामास कमलं तदेकं भुवनेश्वर l l
हृदि विचारितं तेन कुतो वै कमलं गतम l
यातु यातु सूखे नै व् नेत्रं किं कमलं न हि l l
ज्ञात्वातु नेत्र मुद धृत्य सर्व सत्त्वावलं बनम l
पूजयामास भावे न स्तवे णा ने न सर्वथा l l
वेद्यशचै व् वियोगात्मा परावर पामु नीश्वर l l
अनुत्तमो दुराधर्षो मधुर प्रिय दर्शन l
सुरेश शरणं सर्व शब्द ब्रह्म सतां गति l l
कालपक्ष काल्कारीकं कणीकृत वासु कि l
महेष्वासो मही भर्ता निष्कलं को विश्रुड खल l l
द्युमणिस्तर णिर्धन्य सिद्दिद सिद्धि साधन l
विश्वत संवृत स्तुत्यो व्यूढो रस्को महा भुज l l
सर्व योनिर्निरांत को नर नारायाण प्रिय l
निर्लेपो निष्प्रपंचात्मा निर्व्य गोव्यड गनाशन l l
स्तव्य स्तवप्रिय स्तोता व्यास्मूर्ति निरं कुश l
नीरवद्यमयो पायो विद्याराशीर सप्रिय l l
प्रशान्तबुद्दिर क्षुणसं ग्रही नित्य सुन्दर l
वैयाध्रुर्यो दात्रीश शाकल्य शर्वरी पति l l
परमार्थ गुरुर्द्रष्टि शरीराश्रित वत्सल l
सोमो रसज्ञो रसद सर्व सत्तावलंबन l l
एवं नान्मास हस्त्रेणतुष्टाव वृषभध्वजम l
प्रार्थ यामास शंभूच पूज यामास पंकजै l l
परीक्षार्थ हरे स्तवीश कमलेषु महेश्वर l
गोपयामास कमलं तदेकं भुवनेश्वर l l
हृदि विचारितं तेन कुतो वै कमलं गतम l
यातु यातु सूखे नै व् नेत्रं किं कमलं न हि l l
ज्ञात्वातु नेत्र मुद धृत्य सर्व सत्त्वावलं बनम l
पूजयामास भावे न स्तवे णा ने न सर्वथा l l
निर्म मो निरहं कारो निर्मोहो निरुप्रदव l
दर्पहा दर्पदो दृप्त :सर्वर्तु परिवर्तक l l
सहस्त्र जित्स हस्त्राक्षि :स्निन्धप्रकृतिदक्षिण l
भूत भव्य भवननाथ : प्रभवो भूति नाशन l l
अर्थो नर्थो महाकोश पर कायै कपंडित l
निष्कंटक कृतानान्दो निर्व्या जो व्याज मर्दन l l
सत्त्ववान सात्त्विक सत्य कीर्ति स्नेह कृतागम l
अकम्पितो गुण ग्राही नै कात्मानै ककर्म कृत l l
सुप्रीत सुमुख सूक्ष्म सुकरो दक्षिणानिल l
नन्दिस्कंधधरो धुर्य प्रकट प्रीति वर्द्दन l l
अपराजित सर्व सत्त्वो गो विन्द सत्त्ववाहन l
अधृत स्वधृत सिद्ध पूतमूर्तिर्य शोधन l l
वाराश्रुड गध्रु क्छ्रूड गी बलवान कनायक l
श्रुति प्रकाश श्रुतिमाने कबं धुरने ककृत l l
श्री वत्सल शिवारं भ शांत भद्र समीयश l
भूषयो भूषणो भूतिर्भूत क्रुद भूत भावन l l
अकम्पो भक्ति कायस्तू कालहां नीललोहित l
सत्यव्रत महात्यागी नित्य्शां तिपारायण l l
परार्थ वृत्तिर्व रदों विवि क्षुस्तु विशारद l
शुभद शुभकर्ता चशु भनामाशु भ स्वयम l l
अनर्थितो गुण साक्षी ह्मकर्ता कनक प्रभ l
स्वभाव भद्रो मध्यस्थ शीघ्र शीघ्रनाशन l l
शिखण्डी कवची शूली जटी मुण्डीच कुण्डली l
अमृत्यु सर्व द्र्क्सिंहस्ते जोराशिर्म हामणि l l
दर्पहा दर्पदो दृप्त :सर्वर्तु परिवर्तक l l
सहस्त्र जित्स हस्त्राक्षि :स्निन्धप्रकृतिदक्षिण l
भूत भव्य भवननाथ : प्रभवो भूति नाशन l l
अर्थो नर्थो महाकोश पर कायै कपंडित l
निष्कंटक कृतानान्दो निर्व्या जो व्याज मर्दन l l
सत्त्ववान सात्त्विक सत्य कीर्ति स्नेह कृतागम l
अकम्पितो गुण ग्राही नै कात्मानै ककर्म कृत l l
सुप्रीत सुमुख सूक्ष्म सुकरो दक्षिणानिल l
नन्दिस्कंधधरो धुर्य प्रकट प्रीति वर्द्दन l l
अपराजित सर्व सत्त्वो गो विन्द सत्त्ववाहन l
अधृत स्वधृत सिद्ध पूतमूर्तिर्य शोधन l l
वाराश्रुड गध्रु क्छ्रूड गी बलवान कनायक l
श्रुति प्रकाश श्रुतिमाने कबं धुरने ककृत l l
श्री वत्सल शिवारं भ शांत भद्र समीयश l
भूषयो भूषणो भूतिर्भूत क्रुद भूत भावन l l
अकम्पो भक्ति कायस्तू कालहां नीललोहित l
सत्यव्रत महात्यागी नित्य्शां तिपारायण l l
परार्थ वृत्तिर्व रदों विवि क्षुस्तु विशारद l
शुभद शुभकर्ता चशु भनामाशु भ स्वयम l l
अनर्थितो गुण साक्षी ह्मकर्ता कनक प्रभ l
स्वभाव भद्रो मध्यस्थ शीघ्र शीघ्रनाशन l l
शिखण्डी कवची शूली जटी मुण्डीच कुण्डली l
अमृत्यु सर्व द्र्क्सिंहस्ते जोराशिर्म हामणि l l
असंख्यों यो प्रमे यात्मार्वीय वान्वीय कोविद l
वेद्यशचै व् वियोगात्मा परावर पामु नीश्वर l l
अनुत्तमो दुराधर्षो मधुर प्रिय दर्शन l
सुरेश शरणं सर्व शब्द ब्रह्म सतां गति l l
कालपक्ष काल्कारीकं कणीकृत वासु कि l
महेष्वासो मही भर्ता निष्कलं को विश्रुड खल l l
द्युमणिस्तर णिर्धन्य सिद्दिद सिद्धि साधन l
विश्वत संवृत स्तुत्यो व्यूढो रस्को महा भुज l l
सर्व योनिर्निरांत को नर नारायाण प्रिय l
निर्लेपो निष्प्रपंचात्मा निर्व्य गोव्यड गनाशन l l
स्तव्य स्तवप्रिय स्तोता व्यास्मूर्ति निरं कुश l
नीरवद्यमयो पायो विद्याराशीर सप्रिय l l
प्रशान्तबुद्दिर क्षुणसं ग्रही नित्य सुन्दर l
वैयाध्रुर्यो दात्रीश शाकल्य शर्वरी पति l l
परमार्थ गुरुर्द्रष्टि शरीराश्रित वत्सल l
सोमो रसज्ञो रसद सर्व सत्तावलंबन l l
एवं नान्मास हस्त्रेणतुष्टाव वृषभध्वजम l
प्रार्थ यामास शंभूच पूज यामास पंकजै l l
परीक्षार्थ हरे स्तवीश कमलेषु महेश्वर l
गोपयामास कमलं तदेकं भुवनेश्वर l l
हृदि विचारितं तेन कुतो वै कमलं गतम l
यातु यातु सूखे नै व् नेत्रं किं कमलं न हि l l
वेद्यशचै व् वियोगात्मा परावर पामु नीश्वर l l
अनुत्तमो दुराधर्षो मधुर प्रिय दर्शन l
सुरेश शरणं सर्व शब्द ब्रह्म सतां गति l l
कालपक्ष काल्कारीकं कणीकृत वासु कि l
महेष्वासो मही भर्ता निष्कलं को विश्रुड खल l l
द्युमणिस्तर णिर्धन्य सिद्दिद सिद्धि साधन l
विश्वत संवृत स्तुत्यो व्यूढो रस्को महा भुज l l
सर्व योनिर्निरांत को नर नारायाण प्रिय l
निर्लेपो निष्प्रपंचात्मा निर्व्य गोव्यड गनाशन l l
स्तव्य स्तवप्रिय स्तोता व्यास्मूर्ति निरं कुश l
नीरवद्यमयो पायो विद्याराशीर सप्रिय l l
प्रशान्तबुद्दिर क्षुणसं ग्रही नित्य सुन्दर l
वैयाध्रुर्यो दात्रीश शाकल्य शर्वरी पति l l
परमार्थ गुरुर्द्रष्टि शरीराश्रित वत्सल l
सोमो रसज्ञो रसद सर्व सत्तावलंबन l l
एवं नान्मास हस्त्रेणतुष्टाव वृषभध्वजम l
प्रार्थ यामास शंभूच पूज यामास पंकजै l l
परीक्षार्थ हरे स्तवीश कमलेषु महेश्वर l
गोपयामास कमलं तदेकं भुवनेश्वर l l
हृदि विचारितं तेन कुतो वै कमलं गतम l
यातु यातु सूखे नै व् नेत्रं किं कमलं न हि l l
ज्ञात्वातु नेत्र मुद धृत्य सर्व सत्त्वावलं बनम l
पूजयामास भावे न स्तवे णा ने न सर्वथा l l
मामेतिव्याहार ट्रेव प्रादुरा सीज्जगद गुरु l
ततस्तु तम्ठो दृष्ट वा तथा भूतं हरो हरिम l l
तत्स्मादवतता राशु मण्डलात्पार्थिवस्य स l
यथो क्त रूपिणं शंभु तेजोराशिं समुत्थितम l l
नमस्क्रुत्य पुर स्थित्वास्तु तींकृत्वा विशेषत l
पूजयामास देवेश पार्वत्या सहितं शिवम् l l
प्रसन्नवदनो भूत्वाशं भोशच सम्मुखे स्थित l
इत्यं भूतं हरो दृष्ट वा कोटि भास्कर भूषित l l
प्राणिनामीश्वर शंभु देवदेवो जनार्दनम l
तदा प्राह महादेव प्रहसत्रिव शंकर l
संमेक्ष माणंतं विष्णु कृतांजलि पुटं स्थितम l l
शंकर उवाच ---
ज्ञातं ममभेदं सकले देव कार्य जनार्दन l
सुदर्शनाख्यं चक्रं चद दामि तव शोभनम l l
यद् रूपभवता दृष्टं सर्वलोक सुखा वहम l
हितार्य तव देवेशं कृतं भाव्यसु वृतम l l
रणाजिरे पिसं स्म्रूत्यदेवानां दुःख नाशनम l
इदं चक्र मिवदं रूपमिदं नाम सहस्त्र्कम l l
येश्रुणवन्ति सदा भक्त्या सिद्धि स्यादनपायिनी l
एवमुक्त्वा ददौ चक्रं सूर्यायु तसं प्रभम l l
पूजयामास भावे न स्तवे णा ने न सर्वथा l l
मामेतिव्याहार ट्रेव प्रादुरा सीज्जगद गुरु l
ततस्तु तम्ठो दृष्ट वा तथा भूतं हरो हरिम l l
तत्स्मादवतता राशु मण्डलात्पार्थिवस्य स l
यथो क्त रूपिणं शंभु तेजोराशिं समुत्थितम l l
नमस्क्रुत्य पुर स्थित्वास्तु तींकृत्वा विशेषत l
पूजयामास देवेश पार्वत्या सहितं शिवम् l l
प्रसन्नवदनो भूत्वाशं भोशच सम्मुखे स्थित l
इत्यं भूतं हरो दृष्ट वा कोटि भास्कर भूषित l l
प्राणिनामीश्वर शंभु देवदेवो जनार्दनम l
तदा प्राह महादेव प्रहसत्रिव शंकर l
संमेक्ष माणंतं विष्णु कृतांजलि पुटं स्थितम l l
शंकर उवाच ---
ज्ञातं ममभेदं सकले देव कार्य जनार्दन l
सुदर्शनाख्यं चक्रं चद दामि तव शोभनम l l
यद् रूपभवता दृष्टं सर्वलोक सुखा वहम l
हितार्य तव देवेशं कृतं भाव्यसु वृतम l l
रणाजिरे पिसं स्म्रूत्यदेवानां दुःख नाशनम l
इदं चक्र मिवदं रूपमिदं नाम सहस्त्र्कम l l
येश्रुणवन्ति सदा भक्त्या सिद्धि स्यादनपायिनी l
एवमुक्त्वा ददौ चक्रं सूर्यायु तसं प्रभम l l
विष्णु रपिच सं स्त्रात्वाज ग्राहो दड मुखस्तदा l
नमस्कृत्य तदा देव पुनर्व चनमब्र वीत l
श्रुणु देवमया ध्येयं पठनीयंच में प्रभो l
दुखांनां नाशनार्थ हि वदत्वं लोक शंकर l l
इति पृष्ट स्तदा तेन संतुष्टस्तु शिवो ब्रवीत l
रूपं ध्येयं मदीयं वै सर्वा नर्थ प्रशांतये l l
अन्येकदुखनाशार्थ पाठंच नाम सहस्त्र्कम l
धार्य चक्रं सदा मेंद्य सर्वा नर्थ प्रशां तये l l
अन्येच ये पतिष्य'ति पाठयिषयंति नित्यश l
तेषां दुःख न स्वप्ने पि जायते नात्र संशय l l
राज्ञां चसं कटे प्राप्रे शतावर्त चरे द्यता l
सांगच विधि युक्तो हि कल्याणं लभते नर l l
रोग नाशकरं ह्वेत द्धिद्यादायक मुत्त्म्म l
समुद्धि श्य्फलं श्रेशटम पठंति फल्मुत्तम्म l l
लभन्ते नात्रसं देह सत्य्मेतद्दंचमम l
प्रातः समु थ्याय सदा पूजां कृत्वा मदीयाकम l l
पठतो मत्समकक्षं वै नित्यं सिद्धिर्न दूरत l
ऐहिकीं सिद्धि मासाद्य पर लोक समुदभावंम l l
प्राप्नोति पाठको नित्य्मष्ट मासान सुरेश्वर l
सायुज्य मुक्ति मायातिनात्रकार्या विचारणा l l
एवमुक्त्वातदाविष्णुं शंकर प्रीत मानस l
उपस्प्रु श्य्कराभ्यांच उवाच शंकर पुन l l
वरदो स्मिसुर श्रेष्ट वरान्वर यथेप्सितान l
भक्त्या वशीकृतो नूनंस्तवे नाने न वै पुन l l
नमस्कृत्य तदा देव पुनर्व चनमब्र वीत l
श्रुणु देवमया ध्येयं पठनीयंच में प्रभो l
दुखांनां नाशनार्थ हि वदत्वं लोक शंकर l l
इति पृष्ट स्तदा तेन संतुष्टस्तु शिवो ब्रवीत l
रूपं ध्येयं मदीयं वै सर्वा नर्थ प्रशांतये l l
अन्येकदुखनाशार्थ पाठंच नाम सहस्त्र्कम l
धार्य चक्रं सदा मेंद्य सर्वा नर्थ प्रशां तये l l
अन्येच ये पतिष्य'ति पाठयिषयंति नित्यश l
तेषां दुःख न स्वप्ने पि जायते नात्र संशय l l
राज्ञां चसं कटे प्राप्रे शतावर्त चरे द्यता l
सांगच विधि युक्तो हि कल्याणं लभते नर l l
रोग नाशकरं ह्वेत द्धिद्यादायक मुत्त्म्म l
समुद्धि श्य्फलं श्रेशटम पठंति फल्मुत्तम्म l l
लभन्ते नात्रसं देह सत्य्मेतद्दंचमम l
प्रातः समु थ्याय सदा पूजां कृत्वा मदीयाकम l l
पठतो मत्समकक्षं वै नित्यं सिद्धिर्न दूरत l
ऐहिकीं सिद्धि मासाद्य पर लोक समुदभावंम l l
प्राप्नोति पाठको नित्य्मष्ट मासान सुरेश्वर l
सायुज्य मुक्ति मायातिनात्रकार्या विचारणा l l
एवमुक्त्वातदाविष्णुं शंकर प्रीत मानस l
उपस्प्रु श्य्कराभ्यांच उवाच शंकर पुन l l
वरदो स्मिसुर श्रेष्ट वरान्वर यथेप्सितान l
भक्त्या वशीकृतो नूनंस्तवे नाने न वै पुन l l
इत्युक्तो देवदेवेन देवदेवं प्राणम्यतंम l
यथे दानीं कृपा देव क्रियतेचाप्यत परम l l
कार्या चै वविशेषेण कृपालु त्वात्व्या प्रभो l
त्वयिभक्तिं महादेव प्रयच्छ वर मुत्तम l l
णा नयामिच्छामि भगवन्पूतर्णों हंते प्रसादत l
तच्छ्युत्वा वचनं तस्य दया वान्सु तरांभव l l
प्राह्त्वेनं महादेव परमात्मान मच्युतम l
मयि भक्तिश्चवंद्यासत्वं पूज्यशचै वसुरै रपि l l
विश्वं भर सत्व्दीय'वै नाम पापहरं परम l
भविष्यति ण संदेहो मत्प्रसादात्सुरोत्तम l l
इत्यु क्त्वान्तर्दधे रुद्रो भगवात्रीललोहित l
जनार्दनोपि भगवान्व चनाच्छं करस्य्च l l
प्राप्य चक्रं शुभं ध्यानं स्त्रोतमेत त्रिरन्तरम l
प्रपाठा ध्यापयामासभक्ते भ्यस्तदुपादिशत l l
अन्येपि येप ठिष्यन्ति ते विन्दन्तु तथा फलम l
इति पृष्टं समाख्यातं श्रुणवतां पापहारकम l l
यथे दानीं कृपा देव क्रियतेचाप्यत परम l l
कार्या चै वविशेषेण कृपालु त्वात्व्या प्रभो l
त्वयिभक्तिं महादेव प्रयच्छ वर मुत्तम l l
णा नयामिच्छामि भगवन्पूतर्णों हंते प्रसादत l
तच्छ्युत्वा वचनं तस्य दया वान्सु तरांभव l l
प्राह्त्वेनं महादेव परमात्मान मच्युतम l
मयि भक्तिश्चवंद्यासत्वं पूज्यशचै वसुरै रपि l l
विश्वं भर सत्व्दीय'वै नाम पापहरं परम l
भविष्यति ण संदेहो मत्प्रसादात्सुरोत्तम l l
इत्यु क्त्वान्तर्दधे रुद्रो भगवात्रीललोहित l
जनार्दनोपि भगवान्व चनाच्छं करस्य्च l l
प्राप्य चक्रं शुभं ध्यानं स्त्रोतमेत त्रिरन्तरम l
प्रपाठा ध्यापयामासभक्ते भ्यस्तदुपादिशत l l
अन्येपि येप ठिष्यन्ति ते विन्दन्तु तथा फलम l
इति पृष्टं समाख्यातं श्रुणवतां पापहारकम l l
रुद्राष्टकम्
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपं।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥1॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यानगोतीतमीशं गिरीशं।
करालं महाकालकालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥2॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गम्भीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसदभालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा ॥3॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥4॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥ऽ॥
कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥6॥
न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥7॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दुखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विपेण हरतुष्टये ।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु प्रसीदति॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥4॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम्।
त्रयशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥ऽ॥
कलातीत कल्याण कल्पांतकारी। सदासज्जनानन्ददाता पुरारी।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥6॥
न यावद् उमानाथ पादारविंदं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥7॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।
जराजन्म दुखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्न्मामीश शंभो।
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विपेण हरतुष्टये ।
ये पठन्ति नरा भक्तया तेषां शम्भु प्रसीदति॥
आरती श्री शिव जी
ॐ जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा.
ब्रह्मा, विष्णु , सदाशिव, अर्द्धांगी धारा. ॐ जय.
एकानन, चतुरानन, पंचानन राजे.
हंसानन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे. ॐ जय...
दो भुज चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे.
तीनों रुप निरखता, त्रिभुवन जन मोहे. ॐ जय...
अक्षमाला वनमाला, रुण्डमाला धारी.
चन्दन मृग मद सोहे , भोले शुभकारी. ॐ जय...
श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघम्बर अंगे.
सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे. ॐ जय..
कर में मध्य कमंडल चक्र त्रिशूल धरता.
ॐ जय शिव ओंकारा, ॐ जय शिव ओंकारा.
ब्रह्मा, विष्णु , सदाशिव, अर्द्धांगी धारा. ॐ जय.
एकानन, चतुरानन, पंचानन राजे.
हंसानन, गरुड़ासन, वृषवाहन साजे. ॐ जय...
दो भुज चार चतुर्भुज, दस भुज अति सोहे.
तीनों रुप निरखता, त्रिभुवन जन मोहे. ॐ जय...
अक्षमाला वनमाला, रुण्डमाला धारी.
चन्दन मृग मद सोहे , भोले शुभकारी. ॐ जय...
श्वेताम्बर, पीताम्बर, बाघम्बर अंगे.
सनकादिक, ब्रह्मादिक, भूतादिक संगे. ॐ जय..
कर में मध्य कमंडल चक्र त्रिशूल धरता.
जग करता दुख हरता, जग पालन करता. ॐ जय...
ब्रह्मा, विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका
प्रणवाक्षर के मध्य, ये तीनों एका. ॐ जय...
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे.
कहत शिवानन्द स्वामी, मन वांछित फ़ल पावै. ॐ जय.
ब्रह्मा, विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका
प्रणवाक्षर के मध्य, ये तीनों एका. ॐ जय...
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे.
कहत शिवानन्द स्वामी, मन वांछित फ़ल पावै. ॐ जय.
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
